Love Poetry (page 376)
हसरत-ए-दीद रही दीद का ख़्वाहाँ हो कर
अबु मोहम्मद वासिल
दिल में उन का ख़याल आता है
अबु मोहम्मद वासिल
अगर मेरी जबीन-ए-शौक़ वक़्फ़-ए-बंदगी होती
अबु मोहम्मद वासिल
आगे वो जा भी चुके लुत्फ़-ए-नज़ारा भी गया
अबु मोहम्मद वासिल
'सहर' अब होगा मेरा ज़िक्र भी रौशन-दिमाग़ों में
अबु मोहम्मद सहर
रह-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा भी कूचा-ओ-बाज़ार हो जैसे
अबु मोहम्मद सहर
फिर खुले इब्तिदा-ए-इश्क़ के बाब
अबु मोहम्मद सहर
इश्क़ को हुस्न के अतवार से क्या निस्बत है
अबु मोहम्मद सहर
इश्क़ के मज़मूँ थे जिन में वो रिसाले क्या हुए
अबु मोहम्मद सहर
बला-ए-जाँ थी जो बज़्म-ए-तमाशा छोड़ दी मैं ने
अबु मोहम्मद सहर
ज़िंदगी ख़ाक-बसर शोला-ब-जाँ आज भी है
अबु मोहम्मद सहर
ये तो नहीं कि बादिया-पैमा न आएगा
अबु मोहम्मद सहर
वक़्त ग़मनाक सवालों में न बर्बाद करें
अबु मोहम्मद सहर
सब की आँखों में जो समाया था
अबु मोहम्मद सहर
सब इक न इक सराब के चक्कर में रह गए
अबु मोहम्मद सहर
फूलों की तलब में थोड़ा सा आज़ार नहीं तो कुछ भी नहीं
अबु मोहम्मद सहर
खो के देखा था पा के देख लिया
अबु मोहम्मद सहर
काली ग़ज़ल सुनो न सुहानी ग़ज़ल सुनो
अबु मोहम्मद सहर
काम हर ज़ख़्म ने मरहम का किया हो जैसे
अबु मोहम्मद सहर
इश्क़ की सई-ए-बद-अंजाम से डर भी न सके
अबु मोहम्मद सहर
हर ख़ौफ़ हर ख़तर से गुज़रना भी सीखिए
अबु मोहम्मद सहर
गोया चमन चमन न था
अबु मोहम्मद सहर
चाँद का रक़्स सितारों का फ़ुसूँ माँगती है
अबु मोहम्मद सहर
अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके
अबु मोहम्मद सहर
वक़्त-ए-रुख़्सत भीगती पलकों का मंज़र याद है
अबसार अब्दुल अली
जो नहीं लगती थी कल तक अब वही अच्छी लगी
अबसार अब्दुल अली
उस वक़्त दिल पे क्यूँके कहूँ क्या गुज़र गया
आबरू शाह मुबारक
तुम्हारी देख कर ये ख़ुश-ख़िरामी आब-रफ़्तारी
आबरू शाह मुबारक
तुम नज़र क्यूँ चुराए जाते हो
आबरू शाह मुबारक
तुझ हुस्न के बाग़ में सिरीजन
आबरू शाह मुबारक