Love Poetry (page 383)
फ़रेब-ए-ज़ार मोहब्बत-नगर खुला हुआ है
अब्दुर्राहमान वासिफ़
अगर तुम रोक दो इज़हार-ए-लाचारी करूँगा
अब्दुर्राहमान वासिफ़
ज़िंदगी अज़्मत-ए-हाज़िर के बग़ैर
अब्दुर रऊफ़ उरूज
नफ़स के लोच को ख़ंजर बनाना चाहती है
अब्दुर रऊफ़ उरूज
कुछ न किया अरबाब-ए-जुनूँ ने फिर भी इतना काम किया
अब्दुर रऊफ़ उरूज
ख़मोशी मेरी लय में गुनगुनाना चाहती है
अब्दुर रऊफ़ उरूज
जादा-ए-मय पे गुज़र ख़्वाबों का
अब्दुर रऊफ़ उरूज
लाहौर के नाम
अब्दुर्रशीद
एक नज़्म
अब्दुर्रशीद
चुप
अब्दुर्रशीद
फटे पुराने बदन से किसे ख़रीद सकूँ
अब्दुर्रहीम नश्तर
वो सो रहा है ख़ुदा दूर आसमानों में
अब्दुर्रहीम नश्तर
टूट कर देर तलक प्यार किया है मुझ को
अब्दुर्रहीम नश्तर
सफ़ेद-पोश दरिंदों ने गुल खिलाए थे
अब्दुर्रहीम नश्तर
पंछियों के रू-ब-रू क्या ज़िक्र-ए-नादारी करूँ
अब्दुर्रहीम नश्तर
अगर हो ख़ौफ़-ज़दा ताक़त-ए-बयाँ कैसी
अब्दुर्रहीम नश्तर
मिज़्गाँ ने रोका आँखों में दम इंतिज़ार से
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
क्या कीजिए रक़म सनद-ए-एहतिशाम-ए-ज़ुल्फ़
अब्दुल्ल्ला ख़ाँ महर लखनवी
रूठे हैं हम से दोस्त हमारे कहाँ कहाँ
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
लग़्ज़िश-ए-साक़ी-ए-मय-ख़ाना ख़ुदा ख़ैर करे
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
का'बा है कभी तो कभी बुत-ख़ाना बना है
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
दिल दिया वहशत लिया और ख़ुद को रुस्वा कर लिया
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
अच्छा है कोई तीर-बा-नश्तर भी ले चलो
अब्दुल्लतीफ़ शौक़
तुम तो ऐ ख़ुशबू हवाओ उस से मिल कर आ गईं
अब्दुल्लाह कमाल
इक मुसलसल जंग थी ख़ुद से कि हम ज़िंदा हैं आज
अब्दुल्लाह कमाल
चमक दे चाँद को ठंडक हवा को दिल को उमंग
अब्दुल्लाह कमाल
अभी गुनाह का मौसम है आ शबाब में आ
अब्दुल्लाह कमाल
वादा-ए-वस्ल है लज़्ज़त-ए-इंतिज़ार उठा
अब्दुल्लाह कमाल
उस की जाम-ए-जम आँखें शीशा-ए-बदन मेरा
अब्दुल्लाह कमाल
क़दम क़दम पे नया इम्तिहाँ है मेरे लिए
अब्दुल्लाह कमाल