Love Poetry (page 381)

कफ़-ए-ख़िज़ाँ पे खिला मैं इस ए'तिबार के साथ

आबिद सयाल

चाँदनी रात है उदासी है

आबिद सिद्दीक़

ये आज कौन सी तक़्सीर हो गई 'नामी'

आबिद नामी

न जाने रब्त-ए-मसर्रत है किस क़दर ग़म से

आबिद नामी

आप करिश्मा-साज़ हुए हैं होश में है दीवाना भी

आबिद नामी

ज़िंदगी भर जिन्हों ने देखे ख़्वाब

आबिद मुनावरी

सिर्फ़ कर्ब-ए-अना दिया है मुझे

आबिद मुनावरी

मुक़द्दर में साहिल कहाँ है मियाँ

आबिद मुनावरी

लाला-ज़ारों में ज़र्द फूल हूँ मैं

आबिद मुनावरी

ख़ुद सवाल आप ही जवाब हूँ मैं

आबिद मुनावरी

जब आसमान पर मह-ओ-अख़्तर पलट कर आए

आबिद मुनावरी

चाँद से अपनी यारी थी

आबिद मुनावरी

बे-तमन्ना हूँ ख़स्ता-जान हूँ मैं

आबिद मुनावरी

और किस का घर कुशादा है कहाँ ठहरेगी रात

आबिद मुनावरी

अगले पड़ाव पर यूँही ख़ेमा लगाओगे

आबिद मुनावरी

ये मोहब्बत कोई अंजान सी शय होती थी

आबिद मलिक

निकाल लाए हैं सब लोग उस के अक्स में नक़्स

आबिद मलिक

मियाँ ये इश्क़ तो सब टूट कर ही करते हैं

आबिद मलिक

क्यूँ चलती ज़मीं रुकी हुई है

आबिद मलिक

कौन कहता है कि वहशत मिरे काम आई है

आबिद मलिक

इक अजनबी की तरह है ये ज़िंदगी मिरे साथ

आबिद मलिक

दश्त में उस का आब-ओ-दाना है

आबिद मलिक

आसूदगान-ए-हिज्र से मिलने की चाह में

आबिद मलिक

आख़िरी बार ज़माने को दिखाया गया हूँ

आबिद मलिक

किसे ख़बर थी कि ख़ुद को वो यूँ छुपाएगा

आबिद ख़ुर्शीद

था मुख़्तसर वजूद जसीम-ओ-जरी न थी

आबिद काज़मी

न हो हयात का हासिल तो बंदगी क्या है

आबिद काज़मी

ज़र्द मौसम की हवाओं में खड़ा हूँ मैं भी

आबिद करहानी

आलम-ए-ख़्वाब सही ख़्वाब में चलते रहिए

आबिद करहानी

ज़मीं से चल के तो पहुँचा हूँ आसमाँ तक मैं

आबिद हशरी