Sad Poetry (page 105)
सुना तो है कि कभी बे-नियाज़-ए-ग़म थी हयात
फ़िराक़ गोरखपुरी
सितारों से उलझता जा रहा हूँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाह-ए-नाज़ की बातें करो
फ़िराक़ गोरखपुरी
सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
समझता हूँ कि तू मुझ से जुदा है
फ़िराक़ गोरखपुरी
रस्म-ओ-राह-ए-दहर क्या जोश-ए-मोहब्बत भी तो हो
फ़िराक़ गोरखपुरी
रात भी नींद भी कहानी भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
निगाह-ए-नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या क्या
फ़िराक़ गोरखपुरी
नर्म फ़ज़ा की करवटें दिल को दुखा के रह गईं
फ़िराक़ गोरखपुरी
मुझ को मारा है हर इक दर्द ओ दवा से पहले
फ़िराक़ गोरखपुरी
मय-कदे में आज इक दुनिया को इज़्न-ए-आम था
फ़िराक़ गोरखपुरी
लुत्फ़-सामाँ इताब-ए-यार भी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
कुछ न कुछ इश्क़ की तासीर का इक़रार तो है
फ़िराक़ गोरखपुरी
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम
फ़िराक़ गोरखपुरी
कोई पैग़ाम-ए-मोहब्बत लब-ए-एजाज़ तो दे
फ़िराक़ गोरखपुरी
किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में
फ़िराक़ गोरखपुरी
जुनून-ए-कारगर है और मैं हूँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
जिसे लोग कहते हैं तीरगी वही शब हिजाब-ए-सहर भी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
जिन की ज़िंदगी दामन तक है बेचारे फ़रज़ाने हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
जौर-ओ-बे-मेहरी-ए-इग़्माज़ पे क्या रोता है
फ़िराक़ गोरखपुरी
इश्क़ की मायूसियों में सोज़-ए-पिन्हाँ कुछ नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
हो के सर-ता-ब-क़दम आलम-ए-असरार चला
फ़िराक़ गोरखपुरी
हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का पर्दा उठा दिया
फ़िराक़ गोरखपुरी
हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए
फ़िराक़ गोरखपुरी
हर नाला तिरे दर्द से अब और ही कुछ है
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़म तिरा जल्वा-गह-ए-कौन-ओ-मकाँ है कि जो था
फ़िराक़ गोरखपुरी
'फ़िराक़' इक नई सूरत निकल तो सकती है
फ़िराक़ गोरखपुरी
इक रोज़ हुए थे कुछ इशारात ख़फ़ी से
फ़िराक़ गोरखपुरी
दीदार में इक-तरफ़ा दीदार नज़र आया
फ़िराक़ गोरखपुरी