Sad Poetry (page 107)
आरज़ू हसरत-ए-नाकाम से आगे न बढ़ी
फ़िगार उन्नावी
तिरी जुस्तुजू में देखा मैं कहाँ कहाँ से गुज़रा
फ़िगार मुरादाबादी
ख़राब-हाल हूँ हर हाल में ख़राब रहा
फ़ज़लुर्रहमान
रात को ख़्वाब बहुत देखे हैं
फ़ज़्ल ताबिश
मौत माँ की तरह साथ है
फ़ज़्ल ताबिश
एक नज़्म
फ़ज़्ल ताबिश
ये सन्नाटा बहुत महँगा पड़ेगा
फ़ज़्ल ताबिश
रिश्ता खुजियाया हुआ कुत्ता है
फ़ज़्ल ताबिश
रातों के ख़ौफ़ दिन की उदासी ने क्या दिया
फ़ज़्ल ताबिश
न कर शुमार कि हर शय गिनी नहीं जाती
फ़ज़्ल ताबिश
मिलों के शहर में घटता हुआ दिन सोचता होगा
फ़ज़्ल ताबिश
मैं उस के ख़्वाब में कब जा के देख पाया हूँ
फ़ज़्ल ताबिश
कली कली का बदन फोड़ कर जो निकला है
फ़ज़्ल ताबिश
जिन ख़्वाबों से नींद उड़ जाए ऐसे ख़्वाब सजाए कौन
फ़ज़्ल ताबिश
इस कमरे में ख़्वाब रक्खे थे कौन यहाँ पर आया था
फ़ज़्ल ताबिश
ग़म-ए-दौराँ में कहाँ बात ग़म-ए-जानाँ की
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
अहल-ए-हुनर के दिल में धड़कते हैं सब के दिल
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
आँखों का तो काम ही है रोना
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
ज़िंदगी साज़-ए-शिकस्ता की फ़ुग़ाँ ही तो नहीं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
तुम्हीं इक नहीं जाँ-सेताँ और भी हैं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
तामीर-ए-नौ क़ज़ा-ओ-क़दर की नज़र में है
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
कुछ तो मुझे महबूब तिरा ग़म भी बहुत है
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
बहार आई गुल-अफ़्शानी के दिन हैं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
अस्बाब-ए-ज़िंदगी की हर इक चीज़ है गराँ
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
अब वो महकी हुई सी रात नहीं
फ़ज़्ल अहमद करीम फ़ज़ली
ज़िंदगी हो तो कई काम निकल आते हैं
फ़ाज़िल जमीली
सफ़ेद-पोशी-ए-दिल का भरम भी रखना है
फ़ाज़िल जमीली
मुद्दत के ब'अद आज मैं ऑफ़िस नहीं गया
फ़ाज़िल जमीली
मिसाल-ए-शम्अ जला हूँ धुआँ सा बिखरा हूँ
फ़ाज़िल जमीली
मैं ही अपनी क़ैद में था और मैं ही एक दिन
फ़ाज़िल जमीली