Sad Poetry (page 106)
दौर-ए-आग़ाज़-ए-जफ़ा दिल का सहारा निकला
फ़िराक़ गोरखपुरी
बस्तियाँ ढूँढ रही हैं उन्हें वीरानों में
फ़िराक़ गोरखपुरी
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की
फ़िराक़ गोरखपुरी
अपने ग़म का मुझे कहाँ ग़म है
फ़िराक़ गोरखपुरी
अब दौर-ए-आसमाँ है न दौर-ए-हयात है
फ़िराक़ गोरखपुरी
अब अक्सर चुप चुप से रहें हैं यूँही कभू लब खोलें हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
आँखों में जो बात हो गई है
फ़िराक़ गोरखपुरी
आज भी क़ाफ़िला-ए-इश्क़ रवाँ है कि जो था
फ़िराक़ गोरखपुरी
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ
फ़िराक़ गोरखपुरी
तिरे ग़म के सामने कुछ ग़म-ए-दो-जहाँ नहीं है
फ़िगार उन्नावी
हैं ये जज़्बात मिरे दर्द भरे दिल के फ़िगार
फ़िगार उन्नावी
ग़म-ओ-अलम से जो ताबीर की ख़ुशी मैं ने
फ़िगार उन्नावी
फ़ज़ा का तंग होना फ़ितरत-ए-आज़ाद से पूछो
फ़िगार उन्नावी
इक तेरा आसरा है फ़क़त ऐ ख़याल-ए-दोस्त
फ़िगार उन्नावी
दिल चोट सहे और उफ़ न करे ये ज़ब्त की मंज़िल है लेकिन
फ़िगार उन्नावी
ब-क़द्र-ए-ज़ौक़ मेरे अश्क-ए-ग़म की तर्जुमानी है
फ़िगार उन्नावी
तुम हरीम-ए-नाज़ में बैठे हो बेगाने बने
फ़िगार उन्नावी
तूफ़ाँ से बच के दामन-ए-साहिल में रह गया
फ़िगार उन्नावी
शोहरत-ए-तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ आम हुई जाती है
फ़िगार उन्नावी
लब पे झूटे तराने होते हैं
फ़िगार उन्नावी
किसी अपने से होती है न बेगाने से होती है
फ़िगार उन्नावी
जुरअत-ए-इश्क़ हवस-कार हुई जाती है
फ़िगार उन्नावी
जफ़ा-ए-यार को हम लुत्फ़-ए-यार कहते हैं
फ़िगार उन्नावी
हस्ती इक नक़्श-ए-इनइकासी है
फ़िगार उन्नावी
हासिल-ए-ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ नाकाम है
फ़िगार उन्नावी
हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-शम्-ओ-परवाना नहीं कहते
फ़िगार उन्नावी
ग़म-ए-जानाँ से रंगीं और कोई ग़म नहीं होता
फ़िगार उन्नावी
चमन अपने रंग में मस्त है कोई ग़म-गुसार-ए-दिगर नहीं
फ़िगार उन्नावी
चला हूँ अपनी मंज़िल की तरफ़ तो शादमाँ हो कर
फ़िगार उन्नावी