Sad Poetry (page 233)
दिल में याद-ए-बुत-ए-बे-पीर लिए बैठा हूँ
आरज़ू लखनवी
देखें महशर में उन से क्या ठहरे
आरज़ू लखनवी
भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो
आरज़ू लखनवी
बग़ौर देख रहा है अदा-शनास मुझे
आरज़ू लखनवी
अयाँ है बे-रुख़ी चितवन से और ग़ुस्सा निगाहों से
आरज़ू लखनवी
अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भी
आरज़ू लखनवी
ऐ मिरे ज़ख़्म-ए-दिल-नवाज़ ग़म को ख़ुशी बनाए जा
आरज़ू लखनवी
ऐ जज़्ब-ए-मोहब्बत तू ही बता क्यूँकर न असर ले दिल ही तो है
आरज़ू लखनवी
आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं
आरज़ू लखनवी
आँख से दिल में आने वाला
आरज़ू लखनवी
आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं
आरज़ू लखनवी
आज बे-आप हो गए हम भी
आरज़ू लखनवी
तक़दीर हो ख़राब तो तदबीर क्या करे
अरुण कुमार आर्य
माँगने से क़ज़ा नहीं मिलती
अरुण कुमार आर्य
दिल की बाज़ी लगा के देख लिया
अरुण कुमार आर्य
चोट दिल पर लगे और आह ज़बाँ से निकले
अरुण कुमार आर्य
आँख उन से मिरी मिली थी कभी
अरुण कुमार आर्य
हमारी महफ़िलों में बे-हिजाब आने से क्या होगा
अर्शी रामपुरी
हम तो आवारा-ए-सहरा हैं हमें क्या मतलब
अर्शी भोपाली
बहुत अज़ीज़ न क्यूँ हो कि दर्द है तेरा
अर्शी भोपाली
यक़ीन-ए-सुब्ह-ए-चमन है कितना शुऊर-ए-अब्र-ए-बहार क्या है
अर्शी भोपाली
उफ़ुक़ के ख़ूनीं धुँदलकों का सुब्ह नाम नहीं
अर्शी भोपाली
तमाम हुस्न-ए-जहाँ का जवाब हो के रहा
अर्शी भोपाली
शौक़-ए-आवारा दश्त-ओ-दर से है
अर्शी भोपाली
रक़्स-ए-आशुफ़्ता-सरी की कोई तदबीर सही
अर्शी भोपाली
निगाह-ए-शौक़ से कब तक मुक़ाबला करते
अर्शी भोपाली
निगाह तेज़ शुऊ'र-ए-बुलंद रखते हैं
अर्शी भोपाली
न सहरा है न अब दीवार-ओ-दर है
अर्शी भोपाली
मता-ए-शौक़ तो है दर्द-ए-रोज़गार तो है
अर्शी भोपाली
ख़ुलूस-ए-अल्फ़ाज़ काम आया निगाह-ए-अहल-ए-फ़ितन से पहले
अर्शी भोपाली