Sad Poetry (page 231)
शाख़ से फूल से क्या उस का पता पूछती है
असअ'द बदायुनी
सैल-ए-गिर्या का सीने से रिश्ता बहुत
असअ'द बदायुनी
सच बोल के बचने की रिवायत नहीं कोई
असअ'द बदायुनी
रास्ता कोई सफ़र कोई मसाफ़त कोई
असअ'द बदायुनी
पोशीदा क्यूँ है तूर पे जल्वा दिखा के देख
असअ'द बदायुनी
मुझे भी वहशत-ए-सहरा पुकार मैं भी हूँ
असअ'द बदायुनी
मिरी अना मिरे दुश्मन को ताज़ियाना है
असअ'द बदायुनी
मिरे लोग ख़ेमा-ए-सब्र में मिरे शहर गर्द-ए-मलाल में
असअ'द बदायुनी
मौसम-ए-हिज्र तो दाइम है न रुख़्सत होगा
असअ'द बदायुनी
ख़ुशी भी अब सरापा ग़म लगे है
असअ'द बदायुनी
कहते हैं लोग शहर तो ये भी ख़ुदा का है
असअ'द बदायुनी
जो अक्स-ए-यार तह-ए-आब देख सकते हैं
असअ'द बदायुनी
जिसे न मेरी उदासी का कुछ ख़याल आया
असअ'द बदायुनी
हरीफ़ कोई नहीं दूसरा बड़ा मेरा
असअ'द बदायुनी
बिछड़ के तुझ से किसी दूसरे पे मरना है
असअ'द बदायुनी
बड़े नादान थे हम रेत को आब-ए-रवाँ समझे
असअ'द बदायुनी
अजब दिन थे कि इन आँखों में कोई ख़्वाब रहता था
असअ'द बदायुनी
अज़ल के दिन जिन्हें देखा था बज़्म-ए-हुस्न-ए-पिन्हाँ में
आरज़ू सहारनपुरी
वो क़िस्सा-ए-दर्द-आगीं चुप कर दिया था जिस ने
आरज़ू लखनवी
वो हाथ मार पलट कर जो कर दे काम तमाम
आरज़ू लखनवी
सीने में ज़ब्त-ए-ग़म से छाला उभर रहा है
आरज़ू लखनवी
राहबर रहज़न न बन जाए कहीं इस सोच में
आरज़ू लखनवी
हाथ से किस ने साग़र पटका मौसम की बे-कैफ़ी पर
आरज़ू लखनवी
ये दास्तान-ए-दिल है क्या हो अदा ज़बाँ से
आरज़ू लखनवी
वो सर-ए-बाम कब नहीं आता
आरज़ू लखनवी
वो क्या लिखता जिसे इंकार करते भी हिजाब आया
आरज़ू लखनवी
वअ'दा सच्चा है कि झूटा मुझे मालूम न था
आरज़ू लखनवी
उस की तो एक दिल-लगी अपना बना के छोड़ दे
आरज़ू लखनवी
तुम्हें क्या काम नालों से तुम्हें क्या काम आहों से
आरज़ू लखनवी
तस्कीन-ए-दिल का ये क्या क़रीना
आरज़ू लखनवी