Sad Poetry (page 235)
वो आए तो लगा ग़म का मुदावा हो गया है
अरशद कमाल
ख़ाक-ए-सहरा तो बहुत दूर है ऐ वहशत-ए-दिल
अरशद कमाल
नफ़ी ओ इसबात
अरशद कमाल
तलातुम है न जाँ-लेवा भँवर है
अरशद कमाल
समुंदर से किसी लम्हे भी तुग़्यानी नहीं जाती
अरशद कमाल
सच की ख़ातिर सब कुछ खोया कौन लिखेगा
अरशद कमाल
कुछ तो मिल जाए कहीं दीदा-ए-पुर-नम के सिवा
अरशद कमाल
किया है मैं ने ऐसा क्या कि ऐसा हो गया है
अरशद कमाल
कभी जो उस की तमन्ना ज़रा बिफर जाए
अरशद कमाल
कभी अंगड़ाई ले कर जब समुंदर जाग उठता है
अरशद कमाल
हम ज़ीस्त की मौजों से किनारा नहीं करते
अरशद कमाल
हर एक लम्हा-ए-ग़म बहर-ए-बे-कराँ की तरह
अरशद कमाल
फ़िक्र सोई है सर-ए-शाम जगा दी जाए
अरशद कमाल
इक लफ़्ज़ आ गया था जो मेरी ज़बान पर
अरशद कमाल
दर्द की साकित नदी फिर से रवाँ होने को है
अरशद कमाल
ऐ दिल तिरे तुफ़ैल जो मुझ पर सितम हुए
अरशद कमाल
उन की फ़ितरत उस को कहिए या कि फ़ितरत का उसूल
अरशद काकवी
फिर चंद दिनों से वो हर शब ख़्वाबों में हमारे आते हैं
अरशद काकवी
न जाने उस ने खुले आसमाँ में क्या देखा
अरशद जमाल 'सारिम'
क्या कहूँ कितना फ़ुज़ूँ है तेरे दीवाने का दुख
अरशद जमाल 'सारिम'
ख़त्म होता ही नहीं सिलसिला तन्हाई का
अरशद जमाल 'सारिम'
प्यास हर ज़र्रा-ए-सहरा की बुझाई गई है
अरशद जमाल 'सारिम'
पलट कर देखने का मुझ में यारा ही नहीं था
अरशद जमाल 'सारिम'
नित-नए नक़्श से बातिन को सजाता हुआ मैं
अरशद जमाल 'सारिम'
क्या कहूँ कितनी अज़िय्यत से निकाली गई शब
अरशद जमाल 'सारिम'
क्या कहूँ कितना फ़ुज़ूँ है तेरे दीवाने का दुख
अरशद जमाल 'सारिम'
किश्त-ए-एहसास में थोड़ा सा मिला लेंगे तुझे
अरशद जमाल 'सारिम'
फ़ना हुआ तो मैं तार-ए-नफ़स में लौट आया
अरशद जमाल 'सारिम'
दो-चार सितारे ही मिरी आँख में धर जा
अरशद जमाल 'सारिम'
दिखाती है जो ये दुनिया वो बैठा देखता हूँ मैं
अरशद जमाल 'सारिम'