Sad Poetry (page 39)
मिरे शाने पे रहने दो अभी गेसू ज़रा ठहरो
हिदायतुल्लाह ख़ान शम्सी
दोस्तों से तो किनारा भी नहीं कर सकता
हिदायतुल्लाह ख़ान शम्सी
दिल में इक शोर उठाते हैं चले जाते हैं
हिदायतुल्लाह ख़ान शम्सी
बहुत कठिन है डगर थोड़ी दूर साथ चलो
हिदायतुल्लाह ख़ान शम्सी
अपने कहते हैं कोई बात तो दुख होता है
हिदायतुल्लाह ख़ान शम्सी
याद इतना है मिरे लब पे फ़ुग़ाँ आई थी
हीरा लाल फ़लक देहलवी
तन को मिट्टी नफ़स को हवा ले गई
हीरा लाल फ़लक देहलवी
क्या बात है नज़रों से अंधेरा नहीं जाता
हीरा लाल फ़लक देहलवी
अपना घर फिर अपना घर है अपने घर की बात क्या
हीरा लाल फ़लक देहलवी
ऐ शाम-ए-ग़म की गहरी ख़मोशी तुझे सलाम
हीरा लाल फ़लक देहलवी
ज़माना देखता है हंस के चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ मेरी
हीरा लाल फ़लक देहलवी
ये और बात है हर शख़्स के गुमाँ में नहीं
हीरा लाल फ़लक देहलवी
तारों से माहताब से और कहकशाँ से क्या
हीरा लाल फ़लक देहलवी
सुकून-ए-दिल के लिए और क़रार-ए-जाँ के लिए
हीरा लाल फ़लक देहलवी
निय्यत अगर ख़राब हुई है हुज़ूर की
हीरा लाल फ़लक देहलवी
मेरी हस्ती में मिरी ज़ीस्त में शामिल होना
हीरा लाल फ़लक देहलवी
क्या कहें क्यूँकर हुआ तूफ़ान में पैदा क़फ़स
हीरा लाल फ़लक देहलवी
कू-ए-जानाँ में नहीं कोई गुज़र की सूरत
हीरा लाल फ़लक देहलवी
अश्क-ए-ग़म वो है जो दुनिया को दिखा भी न सकूँ
हीरा लाल फ़लक देहलवी
आरास्ता बज़्म-ए-ऐश हुई अब रिंद पिएँगे खुल खुल के
हीरा लाल फ़लक देहलवी
आह-ए-ज़िंदाँ में जो की चर्ख़ पे आवाज़ गई
हीरा लाल फ़लक देहलवी
उतरने वाली दुखों की बरात से पहले
हज़ीं लुधियानवी
उम्र भर बहते हैं ग़म के तुंद-रौ धारों के साथ
हज़ीं लुधियानवी
सर-ता-ब-क़दम ख़ून का जब ग़ाज़ा लगा है
हज़ीं लुधियानवी
फिर फ़ज़ा धुँदला गई आसार हैं तूफ़ान के
हज़ीं लुधियानवी
मिरे रियाज़ का आख़िर असर दिखाई दिया
हज़ीं लुधियानवी
मवाद कर के फ़राहम चमकती सड़कों से
हज़ीं लुधियानवी
इस तरह पैकर-ए-वफ़ा हो जाएँ
हज़ीं लुधियानवी
इस का नहीं है ग़म कोई, जाँ से अगर गुज़र गए
हज़ीं लुधियानवी
इस का नहीं है ग़म कोई जाँ से अगर गुज़र गए
हज़ीं लुधियानवी