Sad Poetry (page 61)

ऐ दोस्त दर्द-ए-दिल का मुदावा किया न जाए

हमीद जालंधरी

आ के वो मुझ ख़स्ता-जाँ पर यूँ करम फ़रमा गया

हमीद जालंधरी

तिश्ना-ए-अज़ली

हमीद अलमास

न सताइश की तमन्ना

हमीद अलमास

मुकाफ़ात

हमीद अलमास

हवा की पुश्त पर

हमीद अलमास

यूँ भी क्या था और अब क्या रह गया

हमीद अलमास

याद माज़ी के चराग़ों को बुझाया न करो

हमीद अलमास

उस के करम से है न तुम्हारी नज़र से है

हमीद अलमास

सरहद-ए-गुल से निकल कर हम जुदा हो जाएँगे

हमीद अलमास

रख दिया है मिरी दहलीज़ पे पत्थर किस ने

हमीद अलमास

फिर किसी याद का दरवाज़ा खुला आहिस्ता

हमीद अलमास

जितने अच्छे लोग हैं वो मुझ से वाबस्ता रहे

हमीद अलमास

घर है तो दर भी होगा दीवार भी रहेगी

हमीद अलमास

चुरा के मेरे ताक़ से किताब कोई ले गया

हमीद अलमास

साँसों को कर्ब ज़ीस्त ग़म-ए-बे-पनाह को

हमदुन उसमानी

कर्ब वहशत उलझनें और इतनी तन्हाई कि बस

हमदुन उसमानी

इक मुजस्सम दर्द हूँ इक आह हूँ

हमदुन उसमानी

ज़रा सोचो तो मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ है

हमदम कशमीरी

यक़ीन कैसे करूँगा गुमाँ में रहता हूँ

हमदम कशमीरी

मिलता है हर चराग़ को साया ज़मीन पर

हमदम कशमीरी

हम ढूँडते फिरते रहे तस्वीर हवा की

हमदम कशमीरी

हुआ है सामने आँखों के ख़ानदाँ आबाद

हमदम कशमीरी

एक क़तरा न कहीं ख़ूँ का बहा मेरे बअ'द

हमदम कशमीरी

छटी है राह से गर्द-ए-मलाल मेरे लिए

हमदम कशमीरी

आगे जो क़दम रक्खा पीछे का न ग़म रक्खा

हलीम कुरेशी

मौसम-ए-हिज्र के आने के शिकायत नहीं की

हलीम कुरेशी

कमरा तो ये कहता है कुछ और हवा आए

हलीम कुरेशी

दर्द को रहने भी दे दिल में दवा हो जाएगी

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा

मरता भला है ज़ब्त की ताक़त अगर न हो

हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा