Sad Poetry (page 62)
मरीज़-ए-इश्क़ की जुज़-मर्ग दुनिया में दवा क्यूँ हो
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
दर्द को रहने भी दे दिल में दवा हो जाएगी
हकीम मोहम्मद अजमल ख़ाँ शैदा
ये तमाशा भी अजब है उन के उठ जाने के बाद
हकीम नासिर
ये दर्द है हमदम उसी ज़ालिम की निशानी
हकीम नासिर
दो घड़ी दर्द ने आँखों में भी रहने न दिया
हकीम नासिर
ज़िंदगी को न बना लें वो सज़ा मेरे बाद
हकीम नासिर
मय-कशी गर्दिश-ए-अय्याम से आगे न बढ़ी
हकीम नासिर
कभी वो हाथ न आया हवाओं जैसा है
हकीम नासिर
जब से तू ने मुझे दीवाना बना रक्खा है
हकीम नासिर
इश्क़ कर के देख ली जो बेबसी देखी न थी
हकीम नासिर
हाए वो वक़्त-ए-जुदाई के हमारे आँसू
हकीम नासिर
ऐ दोस्त कहीं तुझ पे भी इल्ज़ाम न आए
हकीम नासिर
आँखों ने हाल कह दिया होंट न फिर हिला सके
हकीम नासिर
बाद-ए-सरसर है नसीम-ए-गुलिस्ताँ मेरे लिए
हकीम मोहम्मद हुसैन अहक़र
रेज़ा रेज़ा रात भर जो ख़ौफ़ से होता रहा
हकीम मंज़ूर
हर एक आँख को कुछ टूटे ख़्वाब दे के गया
हकीम मंज़ूर
टूट कर बिखरे न सूरज भी है मुझ को डर बहुत
हकीम मंज़ूर
मुंतशिर सायों का है या अक्स-ए-बे-पैकर का है
हकीम मंज़ूर
मेरे सामने मेरे घर का पूरा नक़्शा बिखरा है
हकीम मंज़ूर
कुछ समझ आया न आया मैं ने सोचा है उसे
हकीम मंज़ूर
कोई पयाम अब न पयम्बर ही आएगा
हकीम मंज़ूर
ख़ुशबुओं की दश्त से हमसायगी तड़पाएगी
हकीम मंज़ूर
ख़ुद अपने-आप से मिलने का मैं अपना इरादा हूँ
हकीम मंज़ूर
कब इस ज़मीं की सम्त समुंदर पलट कर आए
हकीम मंज़ूर
हर एक आँख को कुछ टूटे ख़्वाब दे के गया
हकीम मंज़ूर
है इज़्तिराब हर इक रंग को बिखरने का
हकीम मंज़ूर
ढल गया जिस्म में आईने में पत्थर में कभी
हकीम मंज़ूर
छोड़ कर मुझ को कहीं फिर उस ने कुछ सोचा न हो
हकीम मंज़ूर
छोड़ कर बार-ए-सदा वो बे-सदा हो जाएगा
हकीम मंज़ूर
अज़िय्यतों को किसी तरह कम न कर पाया
हकीम मंज़ूर