Sad Poetry (page 63)

अपनी नज़र से टूट कर अपनी नज़र में गुम हुआ

हकीम मंज़ूर

अजब सहरा बदन पर आब का इबहाम रक्खा है

हकीम मंज़ूर

आगे पीछे उस का अपना साया लहराता रहा

हकीम मंज़ूर

मक़्सद-ए-हयात

हाजी लक़ लक़

बहिश्त-ए-बरीँ

हाजी लक़ लक़

हर चोट पर ज़माने की हम मुस्कुराए हैं

हैरत सहरवर्दी

रह रह के कौंदती हैं अंधेरे में बिजलियाँ

हैरत गोंडवी

मुझे ऐ रहनुमा अब छोड़ तन्हा

हैरत गोंडवी

तुझे बातों में लाना चाहता हूँ

हैरत गोंडवी

जुनूँ का मिरे इम्तिहाँ हो रहा है

हैरत गोंडवी

हुस्न है काफ़िर बनाने के लिए

हैरत गोंडवी

हुस्न भी है पनाह में इश्क़ भी है पनाह में

हैरत गोंडवी

'हैरत' के दिल पे वार किया हाए क्या किया

हैरत गोंडवी

है इतना ही अब वास्ता ज़िंदगी से

हैरत गोंडवी

आईना देखता हूँ नज़र आ रहे हो तुम

हैरत गोंडवी

न तो कुछ फ़िक्र में हासिल है न तदबीर में है

हैरत इलाहाबादी

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं

हैरत इलाहाबादी

ये महव हुए देख के बे-साख़्ता-पन को

हैरत इलाहाबादी

सुना है ज़ख़्मी-ए-तेग़-ए-निगह का दम निकलता है

हैरत इलाहाबादी

आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं

हैरत इलाहाबादी

मौत से पहले जहाँ में चंद साँसों का अज़ाब

हैदर क़ुरैशी

वस्ल की शब थी और उजाले कर रक्खे थे

हैदर क़ुरैशी

उस दरबार में लाज़िम था अपने सर को ख़म करते

हैदर क़ुरैशी

तुम्हारे इश्क़ में किस किस तरह ख़राब हुए

हैदर क़ुरैशी

मेरे उस के दरमियाँ जो फ़ासला रक्खा गया

हैदर क़ुरैशी

लफ़्ज़ तेरी याद के सब बे-सदा कर आए हैं

हैदर क़ुरैशी

फ़स्ल-ए-ग़म की जब नौ-ख़ेज़ी हो जाती है

हैदर क़ुरैशी

इक ख़्वाब कि जो आँख भिगोने के लिए है

हैदर क़ुरैशी

अजीब कर्ब-ओ-बला की है रात आँखों में

हैदर क़ुरैशी

अब के उस ने कमाल कर डाला

हैदर क़ुरैशी