Sad Poetry (page 78)
दयार-ए-'दाग़'-ओ-'बेख़ुद' शहर-ए-देहली छोड़ कर तुझ को
हबीब जालिब
चूर था ज़ख़्मों से दिल ज़ख़्मी जिगर भी हो गया
हबीब जालिब
भुला भी दे उसे जो बात हो गई प्यारे
हबीब जालिब
बहुत रौशन है शाम-ए-ग़म हमारी
हबीब जालिब
बातें तो कुछ ऐसी हैं कि ख़ुद से भी न की जाएँ
हबीब जालिब
और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाक़त लिखना
हबीब जालिब
और सब भूल गए हर्फ़ सदाक़त लिखना
हबीब जालिब
अपनों ने वो रंज दिए हैं बेगाने याद आते हैं
हबीब जालिब
अब तेरी ज़रूरत भी बहुत कम है मिरी जाँ
हबीब जालिब
यूँ आती हैं अब मेरे तनफ़्फ़ुस की सदाएँ
हबीब मूसवी
क्या हुआ वीराँ किया गर मोहतसिब ने मय-कदा
हबीब मूसवी
दश्त-ओ-सहरा में हसीं फिरते हैं घबराए हुए
हबीब मूसवी
वो यूँ शक्ल-ए-तर्ज़-ए-बयाँ खींचते हैं
हबीब मूसवी
वो उट्ठे हैं तेवर बदलते हुए
हबीब मूसवी
उस से क्या छुप सके बनाई बात
हबीब मूसवी
शराब पी जान तन में आई अलम से था दिल कबाब कैसा
हबीब मूसवी
शब को नाला जो मिरा ता-ब-फ़लक जाता है
हबीब मूसवी
शब कि मुतरिब था शराब-ए-नाब थी पैमाना था
हबीब मूसवी
सब में हूँ फिर किसी से सरोकार भी नहीं
हबीब मूसवी
रोना इन का काम है हर दम जल जल कर मर जाना भी
हबीब मूसवी
मेहर-ओ-उल्फ़त से मआल-ए-तहज़ीब
हबीब मूसवी
लैस हो कर जो मिरा तर्क-ए-जफ़ा-कार चले
हबीब मूसवी
कोई बात ऐसी आज ऐ मेरी गुल-रुख़्सार बन जाए
हबीब मूसवी
जबीन पर क्यूँ शिकन है ऐ जान मुँह है ग़ुस्से से लाल कैसा
हबीब मूसवी
जब शाम हुई दिल घबराया लोग उठ के बराए सैर चले
हबीब मूसवी
हुए ख़ल्क़ जब से जहाँ में हम हवस-ए-नज़ारा-ए-यार है
हबीब मूसवी
है नौ-जवानी में ज़ोफ़-ए-पीरी बदन में रअशा कमर में ख़म है
हबीब मूसवी
है आठ पहर तू जल्वा-नुमा तिमसाल-ए-नज़र है परतव-ए-रुख़
हबीब मूसवी
फ़िराक़ में दम उलझ रहा है ख़याल-ए-गेसू में जांकनी है
हबीब मूसवी
फ़लक की गर्दिशें ऐसी नहीं जिन में क़दम ठहरे
हबीब मूसवी