Sad Poetry (page 80)
फ़ैज़ पहुँचे हैं जो बहारों से
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
दुनिया को रू-शनास-ए-हक़ीक़त न कर सके
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
और ऐ चश्म-ए-तरब बादा-ए-गुलफ़ाम अभी
हबीब अहमद सिद्दीक़ी
याद जो आए ख़ुद शरमाएँ उफ़ री जवानी हाए ज़माने
हबीब आरवी
इस तरह दर्द का तुम अपने मुदावा करना
हबीब आरवी
हैं धब्बे तेग़-ए-क़ातिल के जिसे धोने नहीं देते
हबीब आरवी
दश्त-ए-ग़म में साया-ए-गेसू न ढूँढ
हबाब तिर्मिज़ी
आज उन्हें देख लिया बज़्म में फ़र्ज़ानों की
हबाब तिर्मिज़ी
उमीद-ओ-बीम के आलम में दिल दहलता है
हबाब हाश्मी
ऐ ग़म-ए-हिज्र रात कितनी है
ग्यान चन्द मंसूर
फ़िक्र की दुनिया में कोलम्बस बना फिरता हूँ मैं
ग्यान चन्द
धरती और अम्बर पर दोनों क्या रानाई बाँट रहे थे
ग्यान चन्द
फिरता हूँ मैं घाटी घाटी सहरा सहरा तन्हा तन्हा
ग्यान चन्द
क्या बताएँ आप से क्या हस्ती-ए-इंसान है
ग्यान चन्द
क्या बताएँ आप से क्या हस्ती-ए-इंसान है
ग्यान चन्द
उड़ना तो बहुत उड़ना अफ़्लाक पे जा रहना
गुलज़ार वफ़ा चौदरी
फ़लाह-ए-आदमियत में सऊबत सह के मर जाना
गुलज़ार देहलवी
ज़ाहिर मुसाफ़िरों का हुनर हो नहीं रहा
गुलज़ार बुख़ारी
वफ़ा की तश्हीर करने वाला फ़रेब-गर है सितम तो ये है
गुलज़ार बुख़ारी
तिरी उमीदों का साथ देगी इनायत-ए-बर्ग-ओ-बार कब तक
गुलज़ार बुख़ारी
तिरी तलब ने फ़लक पे सब के सफ़र का अंजाम लिख दिया है
गुलज़ार बुख़ारी
हम शाद हों क्या जब तक आज़ार सलामत है
गुलज़ार बुख़ारी
दिए से यूँ दिया जलता रहेगा
गुलज़ार बुख़ारी
अक्स-ए-रौशन तिरा आईना-ए-जाँ में रक्खा
गुलज़ार बुख़ारी
आँधी में बिसात उलट गई है
गुलज़ार बुख़ारी
आईने का मुँह भी हैरत से खुला रह जाएगा
गुलज़ार बुख़ारी
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
गुलज़ार
ज़ख़्म कहते हैं दिल का गहना है
गुलज़ार
ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
गुलज़ार
रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चले
गुलज़ार