Sad Poetry (page 82)

ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में

गुलज़ार

खुली किताब के सफ़्हे उलटते रहते हैं

गुलज़ार

काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी

गुलज़ार

कहीं तो गर्द उड़े या कहीं ग़ुबार दिखे

गुलज़ार

जब भी ये दिल उदास होता है

गुलज़ार

हवा के सींग न पकड़ो खदेड़ देती है

गुलज़ार

हर एक ग़म निचोड़ के हर इक बरस जिए

गुलज़ार

गुलों को सुनना ज़रा तुम सदाएँ भेजी हैं

गुलज़ार

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

गुलज़ार

दर्द हल्का है साँस भारी है

गुलज़ार

उठो गले से लिपट जाओ फिर निखर लेना

गुलशनुद्दौला बहार

न कोई दीन होता है न कोई ज़ात होती है

गुलशन बरेलवी

याद नहीं है

गुलनाज़ कौसर

वहम नहीं है

गुलनाज़ कौसर

शब डूब गई

गुलनाज़ कौसर

रात हर बार लिए

गुलनाज़ कौसर

किसी की याद का चेहरा

गुलनाज़ कौसर

हयात-ए-रवाँ

गुलनाज़ कौसर

दर्द

गुलनाज़ कौसर

क्या बात है क्यूँ शहर में अब जी नहीं लगता

गुलनार आफ़रीन

हमें भी अब दर ओ दीवार घर के याद आए

गुलनार आफ़रीन

एक परछाईं तसव्वुर की मिरे साथ रहे

गुलनार आफ़रीन

एक आँसू याद का टपका तो दरिया बन गया

गुलनार आफ़रीन

दिल का हर ज़ख़्म तिरी याद का इक फूल बने

गुलनार आफ़रीन

याद करने का तुम्हें कोई इरादा भी न था

गुलनार आफ़रीन

वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा

गुलनार आफ़रीन

शायद अभी कमी सी मसीहाइयों में है

गुलनार आफ़रीन

शजर-ए-उम्मीद भी जल गया वो वफ़ा की शाख़ भी जल गई

गुलनार आफ़रीन

न साथ देगा कोई राह आश्ना मेरा

गुलनार आफ़रीन

न पूछ ऐ मिरे ग़म-ख़्वार क्या तमन्ना थी

गुलनार आफ़रीन