Sad Poetry (page 84)
दर्द-ए-दिल के साथ क्या मेरे मसीहा कर दिया
गुहर खैराबादी
चराग़ से कभी तारों से रौशनी माँगे
गुहर खैराबादी
बे-ख़बर कैसे हो रहे हो तुम
गुहर खैराबादी
सारे क़ुरआन से उस परी-रू को
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
बिजली चमकी तो अब्र रोया
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
ये इक तेरा जल्वा सनम चार सू है
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
उस को ग़फ़लत-पेशा कह आते हैं हम
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
उल्फ़त ये छुपाएँ हम किसी की
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
तुम वफ़ा का एवज़ जफ़ा समझे
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
तकल्लुम जो कोई करता है फ़ानी
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
क़त्ल उश्शाक़ किया करते हैं
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
नज़्ज़ारा-ए-रुख़-ए-साक़ी से मुझ को मस्ती है
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
मुँह ढाँप के मैं जो रो रहा हूँ
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
लब-ए-जाँ-बख़्श पे दम अपना फ़ना होता है
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
क्यूँकर न ख़ुश हो सर मिरा लटक्का के दार में
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
क्या हैं शैदा-ए-क़द्द-ए-यार दरख़्त
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
किस क़दर मुझ को ना-तवानी है
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
किस नाज़ से वाह हम को मारा
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
खोल दी है ज़ुल्फ़ किस ने फूल से रुख़्सार पर
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
हाथ से कुछ न तिरे ऐ मह-ए-कनआँ होगा
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
हसरत ऐ जाँ शब-ए-जुदाई है
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
दुआएँ माँगीं हैं मुद्दतों तक झुका के सर हाथ उठा उठा कर
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
भूला है बा'द-ए-मर्ग मुझे दोस्त याँ तलक
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
अपना हर उज़्व चश्म-ए-बीना है
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
उल्फ़त का दर्द-ए-ग़म का परस्तार कौन है
गोविन्द गुलशन
शेर जब खुलता है खुलते हैं मआनी क्या क्या
गोविन्द गुलशन
राह-ए-उल्फ़त में मक़ामात पुराने आए
गोविन्द गुलशन
मुंतज़िर आँखें हैं मेरी शाम से
गोविन्द गुलशन
हवा के हाथ में ख़ंजर है और सब चुप हैं
गोविन्द गुलशन
दर्द जब जब जहाँ से गुज़रेगा
गोविन्द गुलशन