Sad Poetry (page 86)
रोज़ रौशन रहें हालात ज़रूरी तो नहीं
गोपाल कृष्णा शफ़क़
रह गई लुट कर बहार-ए-ज़िंदगी
गोपाल कृष्णा शफ़क़
मोहब्बत का जिसे सौदा हुआ है
गोपाल कृष्णा शफ़क़
क्या बताऊँ आज वो मुझ से जुदा क्यूँकर हुआ
गोपाल कृष्णा शफ़क़
हर घड़ी बीमार हो कर रह गई
गोपाल कृष्णा शफ़क़
आते ही जवानी के ली हुस्न ने अंगड़ाई
गोपाल कृष्णा शफ़क़
तेरे मेरे ख़्वाब जुदा
गिरिजा व्यास
ख़ंजर को रग-ए-जाँ से गुज़रने नहीं देगा
गिरिजा व्यास
इक तू ही बर्बाद नहीं
गिरिजा व्यास
आँख में आँसू ठहरा है
गिरिजा व्यास
मिरे पर न बाँधो
ग़ज़ाला ख़ाकवानी
सहरा जंगल सागर पर्बत
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
रखता नहीं है दश्त सरोकार आब से
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
न जाने क़ैद में हूँ या हिफ़ाज़त में किसी की
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कोई इक ज़ाइक़ा नहीं मिलता
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
हिसार-ए-जिस्म मिरा तोड़-फोड़ डालेगा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
हर एक साँस मुझे खींचती है उस की तरफ़
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
अब जो आज़ाद हुए हैं तो ख़याल आया है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
उबल पड़ा यक-ब-यक समुंदर तो मैं ने देखा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
ठहर ठहर के मिरा इंतिज़ार करता चल
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
शक्ल सहरा की हमेशा जानी-पहचानी रहे
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
रखता नहीं है दश्त सरोकार आब से
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
पेड़ अगर ऊँचा मिलता है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
मिली राह वो कि फ़रार का न पता चला
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
मेरे लब तक जो न आई वो दुआ कैसी थी
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
माज़ी! तुझ से ''हाल'' मिरा शर्मिंदा है
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
कहने सुनने का अजब दोनों तरफ़ जोश रहा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
झलकती है मिरी आँखों में बेदारी सी कोई
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
हिसार-ए-जिस्म मिरा तोड़-फोड़ डालेगा
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
हैं और कई रेत के तूफ़ाँ मिरे आगे
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही