Sad Poetry (page 87)
बर्क़ का ठीक अगर निशाना हो
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
बढ़ा जब उस की तवज्जोह का सिलसिला कुछ और
ग़ुलाम मुर्तज़ा राही
वक़्त से हम गिला नहीं करते
ग़ुला मोहम्मद सफ़ीर
याद अश्कों में बहा दी हम ने
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
उम्मीद की सूखती शाख़ों से सारे पत्ते झड़ जाएँगे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
जिन की दर्द-भरी बातों से एक ज़माना राम हुआ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
इरादा था जी लूँगा तुझ से बिछड़ कर
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हम ने तुम्हारे ग़म को हक़ीक़त बना दिया
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हिज्र के तपते मौसम में भी दिल उन से वाबस्ता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
समीता-पाटिल
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कहफ़-उल-क़हत
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
एक ज़ाती नज़्म
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
याद अश्कों में बहा दी हम ने
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
वादे यख़-बस्ता कमरों के अंदर गिरते हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सोते हैं वो आईना ले कर ख़्वाबों में बाल बनाते हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
सोए हुए जज़्बों को जगाना ही नहीं था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
रात का हर इक मंज़र रंजिशों से बोझल था
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
फिर वो दरिया है किनारों से छलकने वाला
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
फिर तो इस बे-नाम सफ़र में कुछ भी न अपने पास रहा
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
पहले इक शख़्स मेरी ज़ात बना
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़र नज़र में अदा-ए-जमाल रखते थे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
मिलने की हर आस के पीछे अन-देखी मजबूरी थी
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
लब पे सुर्ख़ी की जगह जो मुस्कुराहट मल रहे हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
किताब-ए-आरज़ू के गुम-शुदा कुछ बाब रक्खे हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हम ने तो बे-शुमार बहाने बनाए हैं
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हिज्र के तपते मौसम में भी दिल उन से वाबस्ता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हर एक पल की उदासी को जानता है तो आ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
गुलाबों के नशेमन से मिरे महबूब के सर तक
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर