Sad Poetry (page 88)
गलियों की उदासी पूछती है घर का सन्नाटा कहता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
बन में वीराँ थी नज़र शहर में दिल रोता है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
अक्स की सूरत दिखा कर आप का सानी मुझे
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
अकेला दिन है कोई और न तन्हा रात होती है
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
आँख से बिछड़े काजल को तहरीर बनाने वाले
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
आफ़ाक़ में फैले हुए मंज़र से निकल कर
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
उस से न मिलिए जिस से मिले दिल तमाम उम्र
ग़ुलाम मौला क़लक़
किधर क़फ़स था कहाँ हम थे किस तरफ़ ये क़ैद
ग़ुलाम मौला क़लक़
ख़ुदा से डरते तो ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न करते हम
ग़ुलाम मौला क़लक़
फ़िक्र-ए-सितम में आप भी पाबंद हो गए
ग़ुलाम मौला क़लक़
दिल के हर जुज़्व में जुदाई है
ग़ुलाम मौला क़लक़
ज़िंदगी मर्ग की मोहलत ही सही
ग़ुलाम मौला क़लक़
वही वा'दा है वही आरज़ू वही अपनी उम्र-ए-तमाम है
ग़ुलाम मौला क़लक़
उठने में दर्द-ए-मुत्तसिल हूँ मैं
ग़ुलाम मौला क़लक़
उन से कहा कि सिद्क़-ए-मोहब्बत मगर दरोग़
ग़ुलाम मौला क़लक़
उड़ाऊँ न क्यूँ तार-तार-ए-गरेबाँ
ग़ुलाम मौला क़लक़
तुझे कल ही से नहीं बे-कली न कुछ आज ही से रहा क़लक़
ग़ुलाम मौला क़लक़
तेरे वादे का इख़्तिताम नहीं
ग़ुलाम मौला क़लक़
रिश्ता-ए-रस्म-ए-मोहब्बत मत तोड़
ग़ुलाम मौला क़लक़
राज़-ए-दिल दोस्त को सुना बैठे
ग़ुलाम मौला क़लक़
पी भी ऐ माया-ए-शबाब शराब
ग़ुलाम मौला क़लक़
न रहा शिकवा-ए-जफ़ा न रहा
ग़ुलाम मौला क़लक़
न पहुँचे हाथ जिस का ज़ोफ़ से ता-ज़ीस्त दामन तक
ग़ुलाम मौला क़लक़
मातम-ए-दीद है दीदार का ख़्वाहाँ होना
ग़ुलाम मौला क़लक़
क्या आ के जहाँ में कर गए हम
ग़ुलाम मौला क़लक़
कोई कैसा ही साबित हो तबीअ'त आ ही जाती है
ग़ुलाम मौला क़लक़
किस क़दर दिलरुबा-नुमा है दिल
ग़ुलाम मौला क़लक़
ख़ुशी में भी नवा-संज-ए-फ़ुग़ाँ हूँ
ग़ुलाम मौला क़लक़
ख़ुद देख ख़ुदी को ओ ख़ुद-आरा
ग़ुलाम मौला क़लक़
ख़त ज़मीं पर न ऐ फ़ुसूँ-गर काट
ग़ुलाम मौला क़लक़