दिल Poetry (page 274)

शीशे से ज़ियादा नाज़ुक था ये शीशा-ए-दिल जो टूट गया

दानिश फ़राही

कुछ अपने दौर की भी कहानी लिखा करो

दानिश फ़राही

किस क़दर इज़्तिराब है यारो

दानिश फ़राही

हश्र इक गुज़रा है वीराने पे घर होने तक

दानिश फ़राही

ज़र्रे ज़र्रे में महक प्यार की डाली जाए

दानिश अलीगढ़ी

ज़र्रे ज़र्रे में महक प्यार की डाली जाए

दानिश अलीगढ़ी

यूँ मेरे साथ दफ़्न दिल-ए-बे-क़रार हो

दाग़ देहलवी

ये तो नहीं कि तुम सा जहाँ में हसीं नहीं

दाग़ देहलवी

ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती

दाग़ देहलवी

ये गुस्ताख़ी ये छेड़ अच्छी नहीं है ऐ दिल-ए-नादाँ

दाग़ देहलवी

वादा झूटा कर लिया चलिए तसल्ली हो गई

दाग़ देहलवी

तुम्हारा दिल मिरे दिल के बराबर हो नहीं सकता

दाग़ देहलवी

रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा

दाग़ देहलवी

फिरता है मेरे दिल में कोई हर्फ़-ए-मुद्दआ

दाग़ देहलवी

निगह निकली न दिल की चोर ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं निकली

दाग़ देहलवी

मुझ को मज़ा है छेड़ का दिल मानता नहीं

दाग़ देहलवी

मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है

दाग़ देहलवी

मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया

दाग़ देहलवी

क्या क्या फ़रेब दिल को दिए इज़्तिराब में

दाग़ देहलवी

क्या क्या फ़रेब दिल को दिए इज़्तिराब में

दाग़ देहलवी

कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना

दाग़ देहलवी

जिन को अपनी ख़बर नहीं अब तक

दाग़ देहलवी

हज़रत-ए-दिल आप हैं किस ध्यान में

दाग़ देहलवी

हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल

दाग़ देहलवी

फ़सुर्दा-दिल कभी ख़ल्वत न अंजुमन में रहे

दाग़ देहलवी

डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं

दाग़ देहलवी

बने हैं जब से वो लैला नई महमिल में रहते हैं

दाग़ देहलवी

ब'अद मुद्दत के ये ऐ 'दाग़' समझ में आया

दाग़ देहलवी

अभी आई भी नहीं कूचा-ए-दिलबर से सदा

दाग़ देहलवी

ज़ाहिद न कह बुरी कि ये मस्ताने आदमी हैं

दाग़ देहलवी

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