Ghazal Poetry (page 508)

तूफ़ाँ नज़र में है न किनारा नज़र में है

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

सूरत-ए-बर्क़-ए-तपाँ शो'ला-फ़गन उठ्ठे हैं

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

सोज़-ए-ग़म चीज़ है क्या कुछ हमें मा'लूम तो हो

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

शरीक-ए-सोज़-ए-दरूँ जब से हो गए अल्फ़ाज़

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

फूलों को तबस्सुम की अदा तुझ से मिली है

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

मोहब्बत का क़रीना आ गया है

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

जिगर को चाक कि दिल को लहू लहू कीजे

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

जगह जगह से शिकस्ता हैं ख़म हैं दीवारें

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

इश्क़ को बार-ए-ज़िंदगी न कहो

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

हम ने माना हमें बर्बाद करेगी दुनिया

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

गुल ज़ख़्म को आँसू को गुहर हम ने कहा है

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

फ़स्ल-ए-गुल की है आबरू हम से

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

दिल को हर ऐश से बेगाना बना कर छोड़ा

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

दिल को बख़्शा सोज़-ओ-गुदाज़

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

दर्द से जान चुराते हुए डर लगता है

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

चाह की तुम से इल्तिजा की है

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

ब-नाम-ए-इश्क़ ग़म-ए-मो'तबर ज़रूरी है

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

अश्क-ए-ग़म शोरिश-ए-पिन्हाँ की ख़बर देते हैं

मोहम्मद मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा

उजड़े हुए हैं शहर के दीवार-ओ-दर न जा

मोहम्मद ख़ालिद

फिर कोई ख़्वाब तिरे रंगों से जुदा नहीं देखा

मोहम्मद ख़ालिद

महजूर कोई बात दिलेराना लिखेगा

मोहम्मद ख़ालिद

हम शेर सुनाते हैं मफ़्हूम तुम्हारा है

मोहम्मद ख़ालिद

है सफ़र में कारवान-बहर-ओ-बर किस के लिए

मोहम्मद ख़ालिद

ग़ज़ल अपनी रिवायत है ग़ज़ल तहज़ीब से होगी

मोहम्मद ख़ालिद

इक रब्त था ब-रंग-ए-दिगर भी नहीं रहा

मोहम्मद ख़ालिद

चलते चलते यूँही क़दम जब डोलता है

मोहम्मद ख़ालिद

चुल्लू-भर पानी में जाके डूब मर

मोहम्मद कमाल अज़हर

वजूद पर इंहिसार मैं ने नहीं किया था

मोहम्मद इज़हारुल हक़

वजूद पर इंहिसार मैं ने नहीं किया था

मोहम्मद इज़हारुल हक़

तिरे सामने तो समझ रहा था कि फूल था

मोहम्मद इज़हारुल हक़