ख्वाब Poetry (page 48)
पत्थर न बना दे मुझे मौसम की ये सख़्ती
डॉ. पिन्हाँ
ख़्वाब देखे थे टूट कर मैं ने
डॉ. पिन्हाँ
ज़ख़्म शादाब देखते हैं मुझे
डॉ. पिन्हाँ
मंज़र है अभी दूर ज़रा हद्द-ए-नज़र से
डॉ. पिन्हाँ
पुर-लुत्फ़ सुकूँ-बख़्श हवाएँ भी बहुत थीं
डॉक्टर आज़म
ग़म हमारा गुलाब हो जाए
दिनेश ठाकुर
ज़माने ठीक है इन से बहुत हुए रौशन
दिनेश नायडू
रात से दिन का वो जो रिश्ता थी
दिनेश नायडू
जो भी निकले तिरी आवाज़ लगाता निकले
दिनेश नायडू
डरा रहे हैं ये मंज़र भी अब तो घर के मुझे
दिनेश नायडू
चाक पर मिट्टी को मर जाना है
दिनेश नायडू
दोस्तो तुम ने भी देखी है वो सूरत वो शबीह
दिलकश सागरी
रवानी ग़म की जिस में थी वो जौहर दे दिया मैं ने
दिलदार हाश्मी
औरत को चाहिए कि अदालत का रुख़ करे
दिलावर फ़िगार
इश्क़ का परचा
दिलावर फ़िगार
'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो
दिलावर फ़िगार
क्रिकेट और मुशाइरा
दिलावर फ़िगार
चालीस चोर
दिलावर फ़िगार
अल्लामा-'इक़बाल' को शिकवा
दिलावर फ़िगार
या रब मिरे नसीब में अक्ल-ए-हलाल हो
दिलावर फ़िगार
न मिरा मकाँ ही बदल गया न तिरा पता कोई और है
दिलावर फ़िगार
वही सितारा-नुमा इक चराग़ है 'आज़र'
दिलावर अली आज़र
वो बहते दरिया की बे-करानी से डर रहा था
दिलावर अली आज़र
नींद में खुलते हुए ख़्वाब की उर्यानी पर
दिलावर अली आज़र
मुमकिन है कि मिलते कोई दम दोनों किनारे
दिलावर अली आज़र
मंज़र से उधर ख़्वाब की पस्पाई से आगे
दिलावर अली आज़र
लम्हा लम्हा वुसअत-ए-कौन-ओ-मकाँ की सैर की
दिलावर अली आज़र
कुछ भी नहीं है ख़ाक के आज़ार से परे
दिलावर अली आज़र
खींच कर अक्स फ़साने से अलग हो जाओ
दिलावर अली आज़र
कब तक फिरूंगा हाथ में कासा उठा के मैं
दिलावर अली आज़र