ख्वाब Poetry (page 63)

बहुत दिनों से इधर उस को याद भी न किया

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

जुनूँ-नवाज़ सफ़र का ख़याल क्यूँ आया

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

ख़याल आता है अक्सर उतार फेंकूँ बदन

अज़ीम हैदर सय्यद

ज़मीं की ख़ाक तो अफ़्लाक से ज़ियादा है

अज़ीम हैदर सय्यद

ख़्वाहिश-ओ-ख़ाब के आगे भी कहीं जाना है

अज़ीम हैदर सय्यद

पढ़िए सबक़ यही है वफ़ा की किताब का

अज़हर नवाज़

शहर गुम-सुम रास्ते सुनसान घर ख़ामोश हैं

अज़हर नक़वी

कोई ऐसी बात है जिस के डर से बाहर रहते हैं

अज़हर नक़वी

गिर्या-ए-शब की शहादत के लिए जागते हैं

अज़हर नक़वी

गिर्दाब-ए-रेग-ए-जान से मौज-ए-सराब तक

अज़हर नक़वी

एक इक साँस में सदियों का सफ़र काटते हैं

अज़हर नक़वी

हुरूफ़ ख़ाली सदफ़ और निसाब ज़ख़्मों के

अज़हर नैयर

हर एक राह में इम्कान-ए-हादिसा है अभी

अज़हर नैयर

हमारे चेहरे पे रंज-ओ-मलाल ऐसा था

अज़हर नैयर

हर एक शख़्स यहाँ महव-ए-ख़्वाब लगता है

अज़हर इक़बाल

ये बार-ए-ग़म भी उठाया नहीं बहुत दिन से

अज़हर इक़बाल

उन के भी अपने ख़्वाब थे अपनी ज़रूरतें

अज़हर इनायती

नक़्श मिटते हैं तो आता है ख़याल

अज़हर इनायती

हर एक रात को महताब देखने के लिए

अज़हर इनायती

वो तड़प जाए इशारा कोई ऐसा देना

अज़हर इनायती

वो मेरा यार था मुझ को न ये ख़याल आया

अज़हर इनायती

रंगतें मासूम चेहरों की बुझा दी जाएँगी

अज़हर इनायती

क़यामत आएगी माना ये हादिसा होगा

अज़हर इनायती

जब तक सफ़ेद आँधी के झोंके चले न थे

अज़हर इनायती

इस बुलंदी पे कहाँ थे पहले

अज़हर इनायती

हर एक रात को महताब देखने के लिए

अज़हर इनायती

घर का रस्ता जो भूल जाता हूँ

अज़हर इनायती

चलते चलते साल कितने हो गए

अज़हर इनायती

शहर को आतिश-ए-रंजिश के धुआँ तक देखूँ

अज़हर हाश्मी

कभी मधुर कभी मीठी ज़बाँ का शाइ'र हूँ

अज़हर हाश्मी