Heart Broken Poetry (page 113)

वही जो देता है दुनिया को उलझनों से नजात

फ़िरदौस गयावी

ज़ालिम है वो ऐसा कि जफ़ा भी नहीं करता

फ़िरदौस गयावी

ये सच नहीं कि तमाज़त से डर गई है नदी

फ़िरदौस गयावी

वह ज़ुल्म-ओ-सितम ढाए और मुझ से वफ़ा माँगे

फ़िरदौस गयावी

न में यक़ीन में रख्खूँ न तो गुमान में रख

फ़िरदौस गयावी

तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि क़ाफ़िला क्यूँ लुटा

फ़िराक़ जलालपुरी

बड़ा ग़ुरूर है पल भर की नेक-नामी का

फ़िराक़ जलालपुरी

अभी निकलो न घर से तंग आ के

फ़िराक़ जलालपुरी

ज़िंदगी में जो इक कमी सी है

फ़िराक़ गोरखपुरी

ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त

फ़िराक़ गोरखपुरी

ये ज़िंदगी के कड़े कोस याद आते हैं

फ़िराक़ गोरखपुरी

ये ज़िल्लत-ए-इश्क़ तेरे हाथों

फ़िराक़ गोरखपुरी

वो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुए

फ़िराक़ गोरखपुरी

वक़्त-ए-पीरी दोस्तों की बे-रुख़ी का क्या गिला

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुम इसे शिकवा समझ कर किस लिए शरमा गए

फ़िराक़ गोरखपुरी

तू याद आया तिरे जौर-ओ-सितम लेकिन न याद आए

फ़िराक़ गोरखपुरी

शामें किसी को माँगती हैं आज भी 'फ़िराक़'

फ़िराक़ गोरखपुरी

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास

फ़िराक़ गोरखपुरी

रोने वाले हुए चुप हिज्र की दुनिया बदली

फ़िराक़ गोरखपुरी

रोने को तो ज़िंदगी पड़ी है

फ़िराक़ गोरखपुरी

पर्दा-ए-लुत्फ़ में ये ज़ुल्म-ओ-सितम क्या कहिए

फ़िराक़ गोरखपुरी

ख़ुद मुझ को भी ता-देर ख़बर हो नहीं पाई

फ़िराक़ गोरखपुरी

कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में

फ़िराक़ गोरखपुरी

जिस में हो याद भी तिरी शामिल

फ़िराक़ गोरखपुरी

इसी खंडर में कहीं कुछ दिए हैं टूटे हुए

फ़िराक़ गोरखपुरी

इश्क़ अभी से तन्हा तन्हा

फ़िराक़ गोरखपुरी

हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है

फ़िराक़ गोरखपुरी

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त

फ़िराक़ गोरखपुरी

एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें

फ़िराक़ गोरखपुरी

दिल-दुखे रोए हैं शायद इस जगह ऐ कू-ए-दोस्त

फ़िराक़ गोरखपुरी