Hope Poetry (page 136)

अजीब चीज़ है ये शौक़-ए-आरज़ू-मंदी

अर्शी भोपाली

यक़ीन-ए-सुब्ह-ए-चमन है कितना शुऊर-ए-अब्र-ए-बहार क्या है

अर्शी भोपाली

उफ़ुक़ के ख़ूनीं धुँदलकों का सुब्ह नाम नहीं

अर्शी भोपाली

तमाम हुस्न-ए-जहाँ का जवाब हो के रहा

अर्शी भोपाली

मता-ए-शौक़ तो है दर्द-ए-रोज़गार तो है

अर्शी भोपाली

ख़ुलूस-ए-अल्फ़ाज़ काम आया निगाह-ए-अहल-ए-फ़ितन से पहले

अर्शी भोपाली

कारवाँ तीरा-शब में चलते हैं

अर्शी भोपाली

फ़लसफ़ी किस लिए इल्ज़ाम-ए-फ़ना देता है

अर्शी भोपाली

आग़ाज़-ए-आशिक़ी का अल्लाह रे ज़माना

अर्शी भोपाली

हमें मिट के भी ये हसरत कि भटकते उस गली में

अरशद सिद्दीक़ी

न पयाम चाहते हैं न कलाम चाहते हैं

अरशद सिद्दीक़ी

फ़ज़ाएँ कैफ़-ए-बहाराँ से जब महकती हैं

अरशद सिद्दीक़ी

दिलों से यास-ओ-अलम के नक़ाब उतारो तो

अरशद सिद्दीक़ी

जो बुझ गए थे चराग़ फिर से जला रहा है

अरशद नईम

लहू के साथ तबीअत में सनसनाती फिरे

अरशद मलिक

हम जुनूँ पेशा कि रहते थे तिरी ज़ात में गुम

अरशद महमूद नाशाद

कोई नहीं है इंतिज़ार सुब्ह-ए-विसाल के सिवा

अरशद लतीफ़

किसी सूरत अगर इज़हार की सूरत निकल आए

अरशद लतीफ़

वो आए तो लगा ग़म का मुदावा हो गया है

अरशद कमाल

ज़माना कुछ भी कहे तेरी आरज़ू कर लूँ

अरशद कमाल

कुछ तो मिल जाए कहीं दीदा-ए-पुर-नम के सिवा

अरशद कमाल

किया है मैं ने ऐसा क्या कि ऐसा हो गया है

अरशद कमाल

कभी जो उस की तमन्ना ज़रा बिफर जाए

अरशद कमाल

हम ज़ीस्त की मौजों से किनारा नहीं करते

अरशद कमाल

हर एक लम्हा-ए-ग़म बहर-ए-बे-कराँ की तरह

अरशद कमाल

इक लफ़्ज़ आ गया था जो मेरी ज़बान पर

अरशद कमाल

दर्द की साकित नदी फिर से रवाँ होने को है

अरशद कमाल

ऐ दिल तिरे तुफ़ैल जो मुझ पर सितम हुए

अरशद कमाल

जीना है एक शग़्ल सो करते रहे हैं हम

अरशद काकवी

किस की तनवीर से जल उठ्ठे बसीरत के चराग़

अरशद जमाल 'सारिम'