Love Poetry (page 246)

जो सज़ा चाहो मोहब्बत से दो यारो मुझ को

असग़र मेहदी होश

जो इस ज़मीर फ़रोशी के माहेरीन में है

असग़र मेहदी होश

जला जला के दिए पास पास रखते हैं

असग़र मेहदी होश

इस से पहले कि हवा मुझ को उड़ा ले जाए

असग़र मेहदी होश

हमेशा तंग रहा मुझ पे ज़िंदगी का लिबास

असग़र मेहदी होश

चेहरों को बे-नक़ाब समझने लगा था मैं

असग़र मेहदी होश

बे-निशान क़दमों की कहकशाँ पकड़ते हैं

असग़र मेहदी होश

बाहर का माहौल तो हम को अक्सर अच्छा लगता है

असग़र मेहदी होश

बचपन तमाम बूढ़े सवालों में कट गया

असग़र मेहदी होश

पत्थर लिए हर मोड़ पे कुछ लोग खड़े हैं

असग़र गोरखपुरी

हम दश्त से हर शाम यही सोच के घर आए

असग़र गोरखपुरी

इक उम्र मह-ओ-साल की ठोकर में रहा हूँ

असग़र गोरखपुरी

चलते चलते रुक जाता है

असग़र गोरखपुरी

आँखों की नदी सूख गई फिर भी हरा है

असग़र गोरखपुरी

वो नग़्मा बुलबुल-ए-रंगीं-नवा इक बार हो जाए

असग़र गोंडवी

वहीं से इश्क़ ने भी शोरिशें उड़ाई हैं

असग़र गोंडवी

उस जल्वा-गाह-ए-हुस्न में छाया है हर तरफ़

असग़र गोंडवी

सुनता हूँ बड़े ग़ौर से अफ़्साना-ए-हस्ती

असग़र गोंडवी

क़हर है थोड़ी सी भी ग़फ़लत तरीक़-ए-इश्क़ में

असग़र गोंडवी

पहली नज़र भी आप की उफ़ किस बला की थी

असग़र गोंडवी

नियाज़-ए-इश्क़ को समझा है क्या ऐ वाइज़-ए-नादाँ

असग़र गोंडवी

नहीं दैर ओ हरम से काम हम उल्फ़त के बंदे हैं

असग़र गोंडवी

मुझ को ख़बर रही न रुख़-ए-बे-नक़ाब की

असग़र गोंडवी

मैं क्या कहूँ कहाँ है मोहब्बत कहाँ नहीं

असग़र गोंडवी

मैं कामयाब-ए-दीद भी महरूम-ए-दीद भी

असग़र गोंडवी

क्या क्या हैं दर्द-ए-इश्क़ की फ़ित्ना-तराज़ियाँ

असग़र गोंडवी

कुछ मिलते हैं अब पुख़्तगी-ए-इश्क़ के आसार

असग़र गोंडवी

जीना भी आ गया मुझे मरना भी आ गया

असग़र गोंडवी

इश्क़ की बेताबियों पर हुस्न को रहम आ गया

असग़र गोंडवी

इक अदा इक हिजाब इक शोख़ी

असग़र गोंडवी