Love Poetry (page 247)
दास्ताँ उन की अदाओं की है रंगीं लेकिन
असग़र गोंडवी
चला जाता हूँ हँसता खेलता मौज-ए-हवादिस से
असग़र गोंडवी
बे-महाबा हो अगर हुस्न तो वो बात कहाँ
असग़र गोंडवी
'असग़र' हरीम-ए-इश्क़ में हस्ती ही जुर्म है
असग़र गोंडवी
'असग़र' ग़ज़ल में चाहिए वो मौज-ए-ज़िंदगी
असग़र गोंडवी
अक्स किस चीज़ का आईना-ए-हैरत में नहीं
असग़र गोंडवी
ये नंग-ए-आशिक़ी है सूद ओ हासिल देखने वाले
असग़र गोंडवी
ये क्या कहा कि ग़म-ए-इश्क़ नागवार हुआ
असग़र गोंडवी
ये इश्क़ ने देखा है ये अक़्ल से पिन्हाँ है
असग़र गोंडवी
वो नग़्मा बुलबुल-ए-रंगीं-नवा इक बार हो जाए
असग़र गोंडवी
तिरे जल्वों के आगे हिम्मत-ए-शरह-ओ-बयाँ रख दी
असग़र गोंडवी
सिर्फ़ इक सोज़ तो मुझ में है मगर साज़ नहीं
असग़र गोंडवी
शिकवा न चाहिए कि तक़ाज़ा न चाहिए
असग़र गोंडवी
सामने उन के तड़प कर इस तरह फ़रियाद की
असग़र गोंडवी
रक़्स-ए-मस्ती देखते जोश-ए-तमन्ना देखते
असग़र गोंडवी
पाता नहीं जो लज़्ज़त-ए-आह-ए-सहर को मैं
असग़र गोंडवी
न ये शीशा न ये साग़र न ये पैमाना बने
असग़र गोंडवी
न खुले उक़्दा-हा-ए-नाज़-ओ-नियाज़
असग़र गोंडवी
मौजों का अक्स है ख़त-ए-जाम-ए-शराब में
असग़र गोंडवी
मता-ए-ज़ीस्त क्या हम ज़ीस्त का हासिल समझते हैं
असग़र गोंडवी
मस्ती में फ़रोग़-ए-रुख़-ए-जानाँ नहीं देखा
असग़र गोंडवी
मजाज़ कैसा कहाँ हक़ीक़त अभी तुझे कुछ ख़बर नहीं है
असग़र गोंडवी
मय-ए-बे-रंग का सौ रंग से रुस्वा होना
असग़र गोंडवी
कोई महमिल-नशीं क्यूँ शाद या नाशाद होता है
असग़र गोंडवी
ख़ुदा जाने कहाँ है 'असग़र'-ए-दीवाना बरसों से
असग़र गोंडवी
कौन था उस के हवा-ख़्वाहों में जो शामिल न था
असग़र गोंडवी
जो नक़्श है हस्ती का धोका नज़र आता है
असग़र गोंडवी
जीने का न कुछ होश न मरने की ख़बर है
असग़र गोंडवी
जान-ए-नशात हुस्न की दुनिया कहें जिसे
असग़र गोंडवी
इश्वों की है न उस निगह-ए-फ़ित्ना-ज़ा की है
असग़र गोंडवी