Love Poetry (page 267)

अकेले क्या पस-ए-दीवार-ओ-दर गए हम तुम

अनवर शऊर

अगरचे आइना-ए-दिल में है क़याम उस का

अनवर शऊर

आवारा हूँ रैन-बसेरा कोई नहीं मेरा

अनवर शऊर

पागलों की मद्ह में

अनवर सेन रॉय

क्या होना मुमकिन है

अनवर सेन रॉय

इज़ाफ़ी ज़रूरतों के लिए एक नज़्म

अनवर सेन रॉय

ब'अद-अज़-मर्ग

अनवर सेन रॉय

अपने लिए एक नौहा

अनवर सेन रॉय

वो पर्दे से निकल कर सामने जब बे-हिजाब आया

अनवर सहारनपुरी

रंगीं बना के दामन-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर को मैं

अनवर सहारनपुरी

क्यूँ ख़फ़ा हम से हो ख़ता क्या है

अनवर सहारनपुरी

जल्वे दिखाए यार ने अपनी हरीम-ए-नाज़ में

अनवर सहारनपुरी

जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं

अनवर सहारनपुरी

आबाद अब न होगा मय-ख़ाना ज़िंदगी का

अनवर सहारनपुरी

ज़मीं का रिज़्क़ हूँ लेकिन नज़र फ़लक पर है

अनवर सदीद

उस के बग़ैर ज़िंदगी कितनी फ़ुज़ूल है

अनवर सदीद

तू जिस्म है तो मुझ से लिपट कर कलाम कर

अनवर सदीद

शिकवा किया ज़माने का तो उस ने ये कहा

अनवर सदीद

कोई भी पेचीदगी हाएल नहीं अनवर-'सदीद'

अनवर सदीद

ख़ाक हूँ लेकिन सरापा नूर है मेरा वजूद

अनवर सदीद

घुप-अँधेरे में भी उस का जिस्म था चाँदी का शहर

अनवर सदीद

ज़ोर से आँधी चली तो बुझ गए सारे चराग़

अनवर सदीद

उस की अना के बुत को बड़ा कर के देखते

अनवर सदीद

तुझ को तो क़ुव्वत-ए-इज़हार ज़माने से मिली

अनवर सदीद

तू जिस्म है तो मुझ से लिपट कर कलाम कर

अनवर सदीद

सियाहियों का नगर रौशनी से अट जाए

अनवर सदीद

साँसों में मिल गई तिरी साँसों की बास थी

अनवर सदीद

सफ़ीना ले गए मौजों की गर्म-जोशी में

अनवर सदीद

पीले पीले चेहरों में उभरी है आज की शाम

अनवर सदीद

मौसम सर्द हवाओं का

अनवर सदीद