Sad Poetry (page 122)
दबा पड़ा है कहीं दश्त में ख़ज़ाना मिरा
फ़रहत एहसास
चराग़-ए-शहर से शम-ए-दिल-ए-सहरा जलाना
फ़रहत एहसास
बुझ गए सारे चराग़-ए-जिस्म-ओ-जाँ तब दिल जला
फ़रहत एहसास
बीमार हो गया हूँ शिफा-ख़ाना चाहिए
फ़रहत एहसास
बे-रंग बड़े शहर की हस्ती भी वहीं थी
फ़रहत एहसास
बहुत ज़मीन बहुत आसमाँ मिलेंगे तुम्हें
फ़रहत एहसास
बहुत सी आँखें लगीं हैं और एक ख़्वाब तय्यार हो रहा है
फ़रहत एहसास
बहुत मुमकिन था हम दो जिस्म और इक जान हो जाते
फ़रहत एहसास
अजीब तजरबा आँखों को होने वाला था
फ़रहत एहसास
अहल-ए-बदन को इश्क़ है बाहर की कोई चीज़
फ़रहत एहसास
अभी नहीं कि अभी महज़ इस्तिआरा बना
फ़रहत एहसास
अब दिल की तरफ़ दर्द की यलग़ार बहुत है
फ़रहत एहसास
आख़िर उस के हुस्न की मुश्किल को हल मैं ने किया
फ़रहत एहसास
कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से
फ़रहत अब्बास शाह
तुम्हारे ख़्वाब मिरे साथ साथ चलते हैं
फ़रहत अब्बास शाह
तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द
फ़रहत अब्बास शाह
मौत का वक़्त गुज़र जाएगा
फ़रहत अब्बास शाह
कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से
फ़रहत अब्बास शाह
गर दुआ भी कोई चीज़ है तो दुआ के हवाले किया
फ़रहत अब्बास शाह
ज़िक्र-ए-शब के सईद हो गए क्या
फ़रहत अब्बास
ख़याल आतिशीं ख़्वाबीदा सूरतें दी हैं
फ़रहत अब्बास
जब तिरी ज़ात को फैला हुआ दरिया समझूँ
फ़रहत अब्बास
हम से मिल कर कोई गुफ़्तुगू कीजिए
फ़रहत अब्बास
मता-ए-दर्द मआल-ए-हयात है शायद
फ़रहान सालिम
हूँ वारदात का ऐनी गवाह मैं मुझ से
फ़रहान सालिम
अब मुझ से सँभलती नहीं ये दर्द की सौग़ात
फ़रहान सालिम
वो क़ाफ़िला जो रह-ए-शाएरी में कम उतरा
फ़रहान सालिम
उदास शाम में पज़मुर्दा बाद बन के न आ
फ़रहान सालिम
तू मिरी इब्तिदा तू मिरी इंतिहा मैं समुंदर हूँ तू साहिलों की हवा
फ़रहान सालिम
शिकस्त-ए-आसमाँ हो जाऊँगा मैं
फ़रहान सालिम