Sad Poetry (page 172)
आह करना दिल-ए-हज़ीं न कहीं
बेखुद बदायुनी
वो थे जवाब के साहिल पे मुंतज़िर लेकिन
बेकल उत्साही
अज़्म-ए-मोहकम हो तो होती हैं बलाएँ पसपा
बेकल उत्साही
उदास काग़ज़ी मौसम में रंग ओ बू रख दे
बेकल उत्साही
तो पहले मेरा ही हाल-ए-तबाह लिख लीजे
बेकल उत्साही
तमन्ना बन गई है माया-ए-इल्ज़ाम क्या होगा
बेकल उत्साही
नज़र की फ़त्ह कभी क़ल्ब की शिकस्त लगे
बेकल उत्साही
नए ज़माने में अब ये कमाल होने लगा
बेकल उत्साही
मुझ को शिकस्तगी का क़लक़ देर तक रहा
बेकल उत्साही
ख़ुद अपने जुर्म का मुजरिम को ए'तिराफ़ न था
बेकल उत्साही
जब कूचा-ए-क़ातिल में हम लाए गए होंगे
बेकल उत्साही
फ़स्ल-ए-गुल कब लुटी नहीं मालूम
बेकल उत्साही
भीतर बसने वाला ख़ुद बाहर की सैर करे मौला ख़ैर करे
बेकल उत्साही
ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं
बहज़ाद लखनवी
तुम याद मुझे आ जाते हो
बहज़ाद लखनवी
तुम से शिकायत क्या करूँ
बहज़ाद लखनवी
यूँ तो जो चाहे यहाँ साहब-ए-महफ़िल हो जाए
बहज़ाद लखनवी
उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं
बहज़ाद लखनवी
तुम्हारे हुस्न की तस्ख़ीर आम होती है
बहज़ाद लखनवी
मसरूर भी हूँ ख़ुश भी हूँ लेकिन ख़ुशी नहीं
बहज़ाद लखनवी
क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ
बहज़ाद लखनवी
ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ
बहज़ाद लखनवी
होना ही क्या ज़रूर थे ये दो-जहाँ हैं क्यूँ
बहज़ाद लखनवी
है ख़िरद-मंदी यही बा-होश दीवाना रहे
बहज़ाद लखनवी
फ़रियाद है अब लब पर जब अश्क-फ़िशानी थी
बहज़ाद लखनवी
इक बे-वफ़ा को प्यार किया हाए क्या किया
बहज़ाद लखनवी
इक बेवफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया
बहज़ाद लखनवी
दिल मेरा तेरा ताब-ए-फ़रमाँ है क्या करूँ
बहज़ाद लखनवी
ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
बहज़ाद लखनवी
बरसों ग़म-ए-गेसू में गिरफ़्तार तो रक्खा
बेगम लखनवी