Sad Poetry (page 170)
आज खेलेंगे मिरे ख़ून से होली सब लोग
बेताब सूरी
आज मक़्तल में ख़बर है कि चराग़ाँ होगा
बेताब सूरी
न मिला तिरा पता तो मुझे लोग क्या कहेंगे
बेताब लखनवी
तड़प के रह गई बुलबुल क़फ़स में ऐ सय्याद
बेताब अज़ीमाबादी
तुम्हारी याद मेरा दिल ये दिनों चलते पुर्ज़े हैं
बेख़ुद देहलवी
सुन के सारी दास्तान-ए-रंज-ओ-ग़म
बेख़ुद देहलवी
मौत आ रही है वादे पे या आ रहे हो तुम
बेख़ुद देहलवी
हूरों से न होगी ये मुदारात किसी की
बेख़ुद देहलवी
हमें पीने से मतलब है जगह की क़ैद क्या 'बेख़ुद'
बेख़ुद देहलवी
हमें इस्लाम उसे इतना तअल्लुक़ है अभी बाक़ी
बेख़ुद देहलवी
ग़म में डूबे ही रहे दम न हमारा निकला
बेख़ुद देहलवी
दिल तो लेते हो मगर ये भी रहे याद तुम्हें
बेख़ुद देहलवी
दी क़सम वस्ल में उस बुत को ख़ुदा की तो कहा
बेख़ुद देहलवी
आप को रंज हुआ आप के दुश्मन रोए
बेख़ुद देहलवी
आप शर्मा के न फ़रमाएँ हमें याद नहीं
बेख़ुद देहलवी
आप हों हम हों मय-ए-नाब हो तन्हाई हो
बेख़ुद देहलवी
वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी
बेख़ुद देहलवी
उठे तिरी महफ़िल से तो किस काम के उठ्ठे
बेख़ुद देहलवी
तुम हमारे दिल-ए-शैदा को नहीं जानते क्या
बेख़ुद देहलवी
तेशे से कोई काम न फ़रहाद से हुआ
बेख़ुद देहलवी
सब्र आता है जुदाई में न ख़्वाब आता है
बेख़ुद देहलवी
न सही आप हमारे जो मुक़द्दर में नहीं
बेख़ुद देहलवी
न क्यूँ-कर नज़्र दिल होता न क्यूँ-कर दम मिरा जाता
बेख़ुद देहलवी
न अरमाँ बन के आते हैं न हसरत बन के आते हैं
बेख़ुद देहलवी
मेरे हम-राह मिरे घर पे भी आफ़त आई
बेख़ुद देहलवी
माशूक़ हमें बात का पूरा नहीं मिलता
बेख़ुद देहलवी
लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें
बेख़ुद देहलवी
ख़ुदा रक्खे तुझे मेरी बुराई देखने वाले
बेख़ुद देहलवी
कब तक करेंगे जब्र दिल-ए-ना-सुबूर पर
बेख़ुद देहलवी
जो तमाशा नज़र आया उसे देखा समझा
बेख़ुद देहलवी