Sad Poetry (page 176)

मेरे रोने पर किसी की चश्म गिर्यां हाए हाए

बासित भोपाली

कुछ सिला ही न मिला इश्क़ में जल जाने का

बासित भोपाली

कोई मेयार-ए-मोहब्बत न रहा मेरे बा'द

बासित भोपाली

किसी के नक़्श-ए-क़दम का निशाँ नहीं मिलता

बासित भोपाली

जैसे भी ये दुनिया है जो कुछ भी ज़माना है

बासित भोपाली

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

हयात-ओ-मौत का इक सिलसिला है

बासित भोपाली

कैसे याद रही तुझ को

बासिर सुल्तान काज़मी

बढ़ गई तुझ से मिल के तन्हाई

बासिर सुल्तान काज़मी

था जो कभी इक शौक़-ए-फ़ुज़ूल

बासिर सुल्तान काज़मी

कितना काम करेंगे

बासिर सुल्तान काज़मी

ख़त में क्या क्या लिखूँ याद आती है हर बात पे बात

बासिर सुल्तान काज़मी

जिन दिनों ग़म ज़ियादा होता है

बासिर सुल्तान काज़मी

हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या

बासिर सुल्तान काज़मी

होते हैं जो सब के वो किसी के नहीं होते

बासिर सुल्तान काज़मी

हज़ार कहता रहा मैं कि यार एक मिनट

बासिर सुल्तान काज़मी

हर-चंद मेरे हाल से वो बे-ख़बर नहीं

बासिर सुल्तान काज़मी

दिल में हर-चंद आरज़ू थी बहुत

बासिर सुल्तान काज़मी

ज़ोर से साँस जो लेता हूँ तो अक्सर शब-ए-ग़म

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

रिहाई जीते जी मुमकिन नहीं है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

कभी दर पर कभी है रस्ते में

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

ज़ौक़-ए-उल्फ़त अब भी है राहत का अरमाँ अब भी है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

लड़ ही जाए किसी निगार से आँख

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

कौन कहता है नसीम-ए-सहरी आती है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

यूँ खुल गया है राज़-ए-शिकस्त-ए-तलब कभी

बशीर ज़ैदी असीर

ज़ाहिर मिरी शिकस्त के आसार भी नहीं

बशीर सैफ़ी

किसे ख़बर है मैं दिल से कि जाँ से गुज़रूँगा

बशीर सैफ़ी