Sad Poetry (page 177)

ख़ुद अपना ए'तिबार गँवाता रहा हूँ मैं

बशीर सैफ़ी

इस बहर-ए-बे-सदा में कुछ और नीचे जाएँ

बशीर सैफ़ी

हब्स के दिनों में भी घर से कब निकलते हैं

बशीर सैफ़ी

सब की मौजूदगी समझता है

बशीर महताब

न आने के उन के बहाने भी देखे

बशीर महताब

माना उस को गिला नहीं मुझ से

बशीर महताब

किस मस्ती में अब रहता हूँ

बशीर महताब

जब से मिरे रक़ीब का रस्ता बदल गया

बशीर महताब

इक लम्हा भी गुज़ारूँ भला क्यूँ किसी के साथ

बशीर महताब

चले जाना मगर सुन लो मिरे दिल में ये हसरत है

बशीर महताब

आज-कल के शबाब देखे हैं

बशीर महताब

आगही कर्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास

बशीर फ़ारूक़ी

तज़्किरे में तिरे इक नाम को यूँ जोड़ दिया

बशीर फ़ारूक़ी

मैं जितनी देर तिरी याद में उदास रहा

बशीर फ़ारूक़ी

लोगो हम छान चुके जा के समुंदर सारे

बशीर फ़ारूक़ी

मिरी नमाज़ मिरी बंदगी मिरा ईमाँ

बशीर फ़ारूक़

वो सितम-परवर ब-चश्म अश्क-बार आ ही गया

बशीर फ़ारूक़

वो कभी शाख़-ए-गुल-ए-तर की तरह लगता है

बशीर फ़ारूक़

सबा गुल-ए-रेज़ जाँ-परवर फ़ज़ा है

बशीर फ़ारूक़

यारो नए मौसम ने ये एहसान किए हैं

बशीर बद्र

यहाँ एक बच्चे के ख़ून से जो लिखा हुआ है उसे पढ़ें

बशीर बद्र

वो शख़्स जिस को दिल ओ जाँ से बढ़ के चाहा था

बशीर बद्र

वो इंतिज़ार की चौखट पे सो गया होगा

बशीर बद्र

रात का इंतिज़ार कौन करे

बशीर बद्र

फिर याद बहुत आएगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम

बशीर बद्र

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

नहीं है मेरे मुक़द्दर में रौशनी न सही

बशीर बद्र

न उदास हो न मलाल कर किसी बात का न ख़याल कर

बशीर बद्र

मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ चलती है

बशीर बद्र

मिरे साथ चलने वाले तुझे क्या मिला सफ़र में

बशीर बद्र