Sad Poetry (page 179)

मैं कब तन्हा हुआ था याद होगा

बशीर बद्र

कोई लश्कर कि धड़कते हुए ग़म आते हैं

बशीर बद्र

किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते

बशीर बद्र

ख़ून पत्तों पे जमा हो जैसे

बशीर बद्र

ख़ानदानी रिश्तों में अक्सर रक़ाबत है बहुत

बशीर बद्र

कौन आया रास्ते आईना-ख़ाने हो गए

बशीर बद्र

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई

बशीर बद्र

कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी

बशीर बद्र

कभी यूँ भी आ मिरी आँख में कि मिरी नज़र को ख़बर न हो

बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

बशीर बद्र

जब तक निगार-ए-दाश्त का सीना दुखा न था

बशीर बद्र

जब सहर चुप हो हँसा लो हम को

बशीर बद्र

जब रात की तन्हाई दिल बन के धड़कती है

बशीर बद्र

होंटों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते

बशीर बद्र

हँसी मासूम सी बच्चों की कापी में इबारत सी

बशीर बद्र

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है

बशीर बद्र

दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे

बशीर बद्र

चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली

बशीर बद्र

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा

बशीर बद्र

बे-तहाशा सी ला-उबाली हँसी

बशीर बद्र

बड़े ताजिरों की सताई हुई

बशीर बद्र

अगर यक़ीं नहीं आता तो आज़माए मुझे

बशीर बद्र

अब तो अँगारों के लब चूम के सो जाएँगे

बशीर बद्र

मुब्तला-ए-इ'ताब हैं हम लोग

बशीरुद्दीन राज़

जल्वों का उन के दिल को तलब-गार कर दिया

बशीरुद्दीन राज़

हुई मुद्दतें ऐ दिल-ए-हज़ीं न पयाम है न सलाम है

बशीरुद्दीन राज़

दिल जो उम्मीद-वार होता है

बशीरुद्दीन राज़

ज़ख़्म खा के ख़ंदाँ हैं पैरहन-दरीदा हम

बशीर मुंज़िर

मिस्ल-ए-नमरूद हर इक शख़्स ख़ुदाई माँगे

बशीर मुंज़िर

क्या बिछड़ कर रह गया जाने भरी बरसात में

बशीर मुंज़िर