Sad Poetry (page 195)
कंफ़ेशन
अज़ीज़ क़ैसी
बाक़ीस्त शब-ए-फ़ित्ना
अज़ीज़ क़ैसी
ब-नाम-ए-इब्न-ए-आदम
अज़ीज़ क़ैसी
अज़ल-अबद
अज़ीज़ क़ैसी
अल्फ़-ए-लैला की आख़िरी सुब्ह
अज़ीज़ क़ैसी
अहद-नामा-ए-इमराेज़
अज़ीज़ क़ैसी
आईने से
अज़ीज़ क़ैसी
वालिहाना मिरे दिल में मिरी जाँ में आ जा
अज़ीज़ क़ैसी
उन्हें सवाल ही लगता है मेरा रोना भी
अज़ीज़ क़ैसी
उलझाओ का मज़ा भी तिरी बात ही में था
अज़ीज़ क़ैसी
तमीज़ अपने में ग़ैर में क्या तुम्हें जो अपना न कर सके हम
अज़ीज़ क़ैसी
रात की रात पड़ाव का मेला कोच की धूल सवेरे
अज़ीज़ क़ैसी
पस-ए-तर्क-ए-इश्क़ भी उम्र-भर तरफ़-ए-मिज़ा पे तरी रही
अज़ीज़ क़ैसी
मिटा के अंजुमन-ए-आरज़ू सदा दी है
अज़ीज़ क़ैसी
हर आँख लहू सागर है मियाँ हर दिल पत्थर सन्नाटा है
अज़ीज़ क़ैसी
दिल-ख़स्तगाँ में दर्द का आज़र कोई तो आए
अज़ीज़ क़ैसी
आह-ए-बे-असर निकली नाला ना-रसा निकला
अज़ीज़ क़ैसी
तमाम शहर को तारीकियों से शिकवा है
अज़ीज़ नबील
मुसाफ़िरों से कहो अपनी प्यास बाँध रखें
अज़ीज़ नबील
किसी से ज़ेहन जो मिलता तो गुफ़्तुगू करते
अज़ीज़ नबील
वो दुख नसीब हुए ख़ुद-कफ़ील होने में
अज़ीज़ नबील
सुब्ह-सवेरे ख़ुशबू पनघट जाएगी
अज़ीज़ नबील
सर-ए-सहरा-ए-जाँ हम चाक-दामानी भी करते हैं
अज़ीज़ नबील
मोजज़े का दर खुला और इक असा रौशन हुआ
अज़ीज़ नबील
मिरा सवाल है ऐ क़ातिलान-ए-शब तुम से
अज़ीज़ नबील
मैं नींद के ऐवान में हैरान था कल शब
अज़ीज़ नबील
मैं दस्तरस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ
अज़ीज़ नबील
मैं अपने गिर्द लकीरें बिछाए बैठा हूँ
अज़ीज़ नबील
कुछ देर तो दुनिया मिरे पहलू में खड़ी थी
अज़ीज़ नबील
ख़याल-ओ-ख़्वाब का सारा धुआँ उतर चुका है
अज़ीज़ नबील