Sad Poetry (page 238)
मैं अपने आप को भी देखने से क़ासिर हूँ
अरशद अब्दुल हमीद
ग़म-ए-जहान ओ ग़म-ए-यार दो किनारे हैं
अरशद अब्दुल हमीद
सुख़न के चाक में पिन्हाँ तुम्हारी चाहत है
अरशद अब्दुल हमीद
शर्त-ए-दीवार-ओ-दर-ओ-बाम उठा दी है तो क्या
अरशद अब्दुल हमीद
रुकते हुए क़दमों का चलन मेरे लिए है
अरशद अब्दुल हमीद
मुझ को तक़दीर ने यूँ बे-सर-ओ-आसार किया
अरशद अब्दुल हमीद
मुझ सा बेताब यहाँ कोई नहीं मेरे सिवा
अरशद अब्दुल हमीद
मिले जो उस से तो यादों के पर निकल आए
अरशद अब्दुल हमीद
मिरे ख़ेमे ख़स्ता-हाल में हैं मिरे रस्ते धुँद के जाल में हैं
अरशद अब्दुल हमीद
लकीर-ए-संग को अन्क़ा-मिसाल हम ने किया
अरशद अब्दुल हमीद
कोई भी शय हो मियाँ जान से प्यारी किसे है
अरशद अब्दुल हमीद
ख़ामोशी तक तो एक सदा ले गई मुझे
अरशद अब्दुल हमीद
इश्क़ मरहून-ए-हिकायात-ओ-गुमाँ भी होगा
अरशद अब्दुल हमीद
ग़ज़ल में जान पड़ी गुफ़्तुगू में फूल खिले
अरशद अब्दुल हमीद
घटाएँ घिरती हैं बिजली कड़क के गिरती है
अरशद अब्दुल हमीद
ग़लत नहीं है दिल-ए-सुल्ह-ख़ू जो बोलता है
अरशद अब्दुल हमीद
फ़सील-ए-सब्र में रौज़न बनाना चाहती है
अरशद अब्दुल हमीद
चिराग़-ए-दर्द कि शम-ए-तरब पुकारती है
अरशद अब्दुल हमीद
इक तेरी बे-रुख़ी से ज़माना ख़फ़ा हुआ
अर्श सिद्दीक़ी
बस यूँही तन्हा रहूँगा इस सफ़र में उम्र भर
अर्श सिद्दीक़ी
ज़ंजीर से उठती है सदा सहमी हुई सी
अर्श सिद्दीक़ी
वक़्त का झोंका जो सब पत्ते उड़ा कर ले गया
अर्श सिद्दीक़ी
फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर जाता हूँ मैं
अर्श सिद्दीक़ी
क्या साथ तिरा दूँ कि मैं इक मौज-ए-हवा हूँ
अर्श सिद्दीक़ी
हम हद-ए-इंदिमाल से भी गए
अर्श सिद्दीक़ी
हैराँ हूँ कि ये कौन सा दस्तूर-ए-वफ़ा है
अर्श सिद्दीक़ी
ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे
अर्श सिद्दीक़ी
दरवाज़ा तिरे शहर का वा चाहिए मुझ को
अर्श सिद्दीक़ी
बस एक ही कैफ़िय्यत-ए-दिल सुब्ह-ओ-मसा है
अर्श सिद्दीक़ी
बंद आँखों से न हुस्न-ए-शब का अंदाज़ा लगा
अर्श सिद्दीक़ी