Sad Poetry (page 239)

अज़ाब-ए-बे-दिली-ए-जान-ए-मुब्तला न गया

अर्श सिद्दीक़ी

आँखों में कहीं उस के भी तूफ़ाँ तो नहीं था

अर्श सिद्दीक़ी

ज़िंदगी कुछ सोज़ है कुछ साज़ है

अर्श सहबाई

ये आइना था मगर ग़म की रहगुज़ार में था

अर्श सहबाई

उन से इज़हार-ए-शिकायत करूँ या न करूँ

अर्श सहबाई

मैं हूँ ऐसे बिखरा सा

अर्श सहबाई

कश्ती-ए-दिल नज़्र-ए-तूफ़ाँ हो गई

अर्श सहबाई

हज़ार हादसात-ए-ग़म रवाँ-दवाँ लिए हुए

अर्श सहबाई

हंगामा-हा-ए-बादा-ओ-पैमाना देख कर

अर्श सहबाई

दिल-ए-मुज़्तर से नालाँ हैं उधर वो भी इधर हम भी

अर्श सहबाई

दिल-ए-बेताब को बहलाने चले आए हैं

अर्श सहबाई

वो सहरा जिस में कट जाते हैं दिन याद-ए-बहाराँ से

अर्श मलसियानी

तौबा तौबा ये बला-ख़ेज़ जवानी तौबा

अर्श मलसियानी

मौत ही इंसान की दुश्मन नहीं

अर्श मलसियानी

दर्द मेराज को पहुँचता है

अर्श मलसियानी

'अर्श' पहले ये शिकायत थी ख़फ़ा होता है वो

अर्श मलसियानी

मेरे प्यारे वतन

अर्श मलसियानी

मेरा वतन

अर्श मलसियानी

मैं क्यूँ भूल जाऊँ

अर्श मलसियानी

जश्न-ए-आज़ादी

अर्श मलसियानी

दीवाली

अर्श मलसियानी

15 अगस्त (1949)

अर्श मलसियानी

ये दुनिया है उसे दार-उल-फ़ितन कहना ही पड़ता है

अर्श मलसियानी

वो ले के हौसला-ए-अज़्म-ए-बे-पनाह चले

अर्श मलसियानी

तू अगर दिल में एक बार आए

अर्श मलसियानी

तरब के मख़मसे ग़म के झमेले

अर्श मलसियानी

रहगुज़र रहगुज़र से पूछ लिया

अर्श मलसियानी

पहला सा वो जुनून-ए-मोहब्बत नहीं रहा

अर्श मलसियानी

मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है

अर्श मलसियानी

कारवाँ से कुछ इस तरह बिछड़े

अर्श मलसियानी