Sad Poetry (page 240)

इश्क़-ए-बुताँ का ले के सहारा कभी कभी

अर्श मलसियानी

एहसास-ए-हुस्न बन के नज़र में समा गए

अर्श मलसियानी

दिल-ए-फ़सुर्दा पे सौ बार ताज़गी आई

अर्श मलसियानी

दर्द का हाल आह से पूछो

अर्श मलसियानी

अगर तक़दीर तेरी बाइस-ए-आज़ार हो जाए

अर्श मलसियानी

ताज-ए-ज़र्रीं न कोई मसनद-ए-शाही माँगूँ

अरमान नज्मी

पिछली रफ़ाक़तों का न इतना मलाल कर

अरमान नज्मी

निगाह-ए-तिश्ना से हैरत का बाब देखते हैं

अरमान नज्मी

कभी तो आ के मिलो मेरा हाल तो पूछो

अरमान नज्मी

गिरते उभरते डूबते धारे से कट गया

अरमान नज्मी

इक बे-निशान हर्फ़-ए-सदा की तरफ़ न देख

अरमान नज्मी

बुझी नहीं अभी ये प्यास भी ग़नीमत है

अरमान नज्मी

अपनी सच्चाई का आज़ार जो पाले हुए हैं

अरमान नज्मी

ये शहर है वो शहर कि जिस में हैं बे-वज्ह कामयाब चेहरे

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

सूरज उगा तो ज़िंदगी की शाम हो गई

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

कभी जो ख़त्म न हो ऐसी ताज़गी दे दी

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

जब सितारों की रिदा काँधे से सरकाती है रात

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

हम हैं और ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ है आज-कल

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

ये दिन

आरिफ़ा शहज़ाद

गिर्हें खुलती नहीं

आरिफ़ा शहज़ाद

देख लो गे ख़ुद!

आरिफ़ा शहज़ाद

कैसा मातम कैसा रोना मिट्टी का

आरिफ़ शफ़ीक़

तू ज़मीं पर है कहकशाँ जैसा

आरिफ़ शफ़ीक़

कैसा मातम कैसा रोना मिट्टी का

आरिफ़ शफ़ीक़

जो अपनी ख़्वाहिशों में तू ने कुछ कमी कर ली

आरिफ़ शफ़ीक़

जब भी दुश्मन बन के इस ने वार किया

आरिफ़ शफ़ीक़

हमें नज़दीक कब दिल की मोहब्बत खींच लाती है

आरिफ़ शफ़ीक़

घर से चीख़ें उठ रही थीं और मैं जागा न था

आरिफ़ शफ़ीक़

दोज़ख़ भी क्या गुमान है जन्नत भी है फ़रेब

आरिफ़ शफ़ीक़

अंधे अदम वजूद के गिर्दाब से निकल

आरिफ़ शफ़ीक़