Sad Poetry (page 248)

नज़र आए क्या मुझ से फ़ानी की सूरत

अनवर देहलवी

न मैं समझा न आप आए कहीं से

अनवर देहलवी

हो रहा है टुकड़े टुकड़े दिल मेरे ग़म-ख़्वार का

अनवर देहलवी

है भी और फिर नज़र नहीं आती

अनवर देहलवी

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

अश्क बेताब व निगह बे-बाक व चश्म-ए-तर ख़राब

अनवर देहलवी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

आँखें दिखाईं ग़ैर को मेरी ख़ता के साथ

अनवर देहलवी

ये नर्म हाथ मरे हाथ में थमा दीजे

अनवर अंजुम

कोई सदा न दूर तलक नक़्श-ए-पा कोई

अनवर अंजुम

खिला है फूल बहुत रोज़ में मुक़द्दर का

अनवर अंजुम

कब लज़्ज़तों ने ज़ेहन का पीछा नहीं किया

अनवर अंजुम

धूप हो गए साए जल गए शजर जैसे

अनवर अंजुम

चुप बैठा में अक्सर सोचता रहता हूँ

अनवर अंजुम

कोई भी सजनी किसी भी साजन की मुंतज़िर है न मुज़्तरिब है

अनवर अलीमी

नए दिनों के नए सहीफ़ों में ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा नहीं है

अनवर अलीमी

ज़ख़्म-ए-नज़ारा ख़ून-ए-नज़र देखते रहो

अनवर मोअज़्ज़म

ये क़िस्सा-ए-ग़म-ए-दिल है तो बाँकपन से चले

अनवर मोअज़्ज़म

ये ग़ज़ल की अंजुमन है ज़रा एहतिमाम कर लो

अनवर मोअज़्ज़म

हमें भूला नहीं अफ़्साना दिल का

अनवर मोअज़्ज़म

ग़म-ए-हबीब ग़म-ए-दो-जहाँ नहीं होता

अनवर मोअज़्ज़म

दीदा-ए-तर ने अजब जल्वागरी देखी है

अनवर मोअज़्ज़म

आज कुछ यूँ शब-ए-तन्हाई का अफ़्साना चले

अनवर मोअज़्ज़म

शहर-दर-शहर फ़ज़ाओं में धुआँ है अब के

अनवर महमूद खालिद

ख़ुदा भी मेरी तरह बा-कमाल ऐसा था

अनवर महमूद खालिद

जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद

जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद

अन-कहे लफ़्ज़ों में मतलब ढूँढता रहता हूँ मैं

अनवर महमूद खालिद

अन-कहे लफ़्ज़ों का मतलब ढूँढता रहता हूँ मैं

अनवर महमूद खालिद

फ़ज़ा-ए-दिल में घनी तीरगी सी लगती है

अनुभव गुप्ता