Sad Poetry (page 260)

ख़्वाब जो बिखर गए

आमिर उस्मानी

इल्तिजा

आमिर उस्मानी

थी सियाहियों का मस्कन मिरी ज़िंदगी की वादी

आमिर उस्मानी

न सकत है ज़ब्त-ए-ग़म की न मजाल-ए-अश्क-बारी

आमिर उस्मानी

लौटे कुछ इस तरह तिरी जल्वा-सरा से हम

आमिर उस्मानी

इश्क़ के मराहिल में वो भी वक़्त आता है

आमिर उस्मानी

ग़म-ए-बेहद में किस को ज़ब्त का मक़्दूर होता है

आमिर उस्मानी

दिल पे वो वक़्त भी किस दर्जा गिराँ होता है

आमिर उस्मानी

दर्द बढ़ता गया जितने दरमाँ किए प्यास बढ़ती गई जितने आँसू पिए

आमिर उस्मानी

मुझ को ख़ामोशी-ए-हालात से डर लगता है

आमिर रियाज़

मैं ने तूफ़ान से पहले का इशारा देखा

आमिर रियाज़

ज़मीं के जिस्म पे यूँ यूरिश-ए-क़ज़ा कब तक

आमिर नज़र

यूँ तो बिखरे थे मगर कुछ तो कहीं पर कुछ था

आमिर नज़र

तअ'ल्लुक़ात के सारे दिए बुझे हुए थे

आमिर नज़र

शब को जब यूरिश-ए-विज्दान में आ जाते हैं

आमिर नज़र

सहर की जुम्बिश क़द-ए-मतानत पे रह गई थी

आमिर नज़र

नुक़्ता-ए-बे-नूर ने मिनहाज-ए-इम्काँ कर दिया

आमिर नज़र

मौज-दर-मौज तो साहिल की रगों पर दौड़े

आमिर नज़र

लम्स-ए-यक़ीन अपना कहाँ पेश-ओ-पस में था

आमिर नज़र

कुछ सुलगते हुए ख़्वाबों की फ़रावानी है

आमिर नज़र

खुला है तेरे बदन का भी इस्तिआरा कुछ

आमिर नज़र

ख़ामोशियों को आलम-ए-अस्वात पर कभी

आमिर नज़र

जबीं को चैन कहाँ ज़ेर-ए-लब दुआ है बस

आमिर नज़र

हमारे चेहरों में पिन्हाँ हैं ज़ाविए क्या क्या

आमिर नज़र

फ़िशार-ए-तीरह-शबी से सहर निकल आए

आमिर नज़र

एक इक तार-ए-नफ़स आशुफ़्ता-ए-आहंग था

आमिर नज़र

दश्त के खेमा-ए-दरिया में मकीं कोई था

आमिर नज़र

दरून-ए-जिस्म की दीवार से उभरती है

आमिर नज़र

दरपेश तो हैं दीदा-ए-हैरान हज़ारों

आमिर नज़र

चश्म-ए-बे-कैफ़ में कारिंदा-ए-मंज़र न रहा

आमिर नज़र