Sad Poetry (page 261)
बोसीदा सही ज़ेब-ए-क़बा तक नहीं आती
आमिर नज़र
ए'तिबार-ए-शौक़ इक धोका सही
आमिर मौसवी
दिन को कह दें रात हम समझे नहीं
आमिर मौसवी
तह कर चुके बिसात-ए-ग़म-ओ-फ़िक्र-ए-रोज़गार
अमीर हम्ज़ा साक़िब
लहू जिगर का हुआ सर्फ़-ए-रंग-ए-दस्त-ए-हिना
अमीर हम्ज़ा साक़िब
तेरी इनायतों का अजब रंग ढंग था
अमीर हम्ज़ा साक़िब
तिरे ख़याल के जब शामियाने लगते हैं
अमीर हम्ज़ा साक़िब
निज़ाम-ए-बस्त-ओ-कुशाद-ए-मानी सँवारते हैं
अमीर हम्ज़ा साक़िब
न तो बे-करानी-ए-दिल रही न तो मद्द-ओ-जज़्र-ए-तलब रहा
अमीर हम्ज़ा साक़िब
ख़ुश-आमदीद कहता गुलों का जहान था
अमीर हम्ज़ा साक़िब
ख़याल-ए-यार का सिक्का उछालने में गया
अमीर हम्ज़ा साक़िब
हैरान बहुत ताबिश-ए-हुस्न-दीगराँ थी
अमीर हम्ज़ा साक़िब
दश्त-ए-बला-ए-शौक़ में ख़ेमे लगाए हैं
अमीर हम्ज़ा साक़िब
कुछ तो एहसास-ए-मोहब्बत से हुईं नम आँखें
अमीता परसुराम 'मीता'
शिद्दत-ए-शौक़ से अफ़्साने तो हो जाते हैं
अमीता परसुराम 'मीता'
न तो ख़ौफ़ रोज़-ए-जज़ा का हो वही इश्क़ है
अमीता परसुराम 'मीता'
खींच लाया तुझे एहसास-ए-तहफ़्फ़ुज़ मुझ तक
अमीता परसुराम 'मीता'
हज़ारों मंज़िलें फिर भी मिरी मंज़िल है तू ही तू
अमीता परसुराम 'मीता'
बन गए दिल के फ़साने क्या क्या
अमीता परसुराम 'मीता'
ब-मजबूरी हर इक रंज-ओ-मेहन लिखना पड़ा मुझ को
अमीरुल इस्लाम हाशमी
तुम राह में चुप-चाप खड़े हो तो गए हो
अमीर क़ज़लबाश
सुना है अब भी मिरे हाथ की लकीरों में
अमीर क़ज़लबाश
क़त्ल हो तो मेरा सा मौत हो तो मेरी सी
अमीर क़ज़लबाश
मुज़्तरिब हैं मौजें क्यूँ उठ रहे हैं तूफ़ाँ क्यूँ
अमीर क़ज़लबाश
क्या गुज़रती है मिरे बाद उस पर
अमीर क़ज़लबाश
होना पड़ा है ख़ूगर-ए-ग़म भी ख़ुशी की ख़ैर
अमीर क़ज़लबाश
ज़बाँ है मगर बे-ज़बानों में है
अमीर क़ज़लबाश
उसे बेचैन कर जाऊँगा मैं भी
अमीर क़ज़लबाश
उन की बे-रुख़ी में भी इल्तिफ़ात शामिल है
अमीर क़ज़लबाश
पाईं हर एक राह-गुज़र पर उदासियाँ
अमीर क़ज़लबाश