Sad Poetry (page 338)
चल निकलो
आदिल मंसूरी
बुध
आदिल मंसूरी
अलिफ़ लफ़्ज़ ओ मआनी से मुबर्रा
आदिल मंसूरी
वुसअत-ए-दामन-ए-सहरा देखूँ
आदिल मंसूरी
वो तुम तक कैसे आता
आदिल मंसूरी
सोए हुए पलंग के साए जगा गया
आदिल मंसूरी
साँस की आँच ज़रा तेज़ करो
आदिल मंसूरी
फिर किसी ख़्वाब के पर्दे से पुकारा जाऊँ
आदिल मंसूरी
फैले हुए हैं शहर में साए निढाल से
आदिल मंसूरी
न कोई रोक सका ख़्वाब के सफ़ीरों को
आदिल मंसूरी
मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ
आदिल मंसूरी
कौन था वो ख़्वाब के मल्बूस में लिपटा हुआ
आदिल मंसूरी
जो चीज़ थी कमरे में वो बे-रब्त पड़ी थी
आदिल मंसूरी
जीता है सिर्फ़ तेरे लिए कौन मर के देख
आदिल मंसूरी
जलने लगे ख़ला में हवाओं के नक़्श-ए-पा
आदिल मंसूरी
इबलाग़ के बदन में तजस्सुस का सिलसिला
आदिल मंसूरी
हुआ ख़त्म दरिया तो सहरा लगा
आदिल मंसूरी
हाथ में आफ़्ताब पिघला कर
आदिल मंसूरी
घूम रहा था एक शख़्स रात के ख़ारज़ार में
आदिल मंसूरी
एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया
आदिल मंसूरी
दूर उफ़ुक़ के पार से आवाज़ के पर्वरदिगार
आदिल मंसूरी
दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का
आदिल मंसूरी
चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई
आदिल मंसूरी
चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को
आदिल मंसूरी
बदन पर नई फ़स्ल आने लगी
आदिल मंसूरी
अब टूटने ही वाला है तन्हाई का हिसार
आदिल मंसूरी
दुम
आदिल लखनवी
दर्द-ए-दिल के तबीब होते हैं
आदिल हयात
आने वाला है कोई मेहमान क्या
आदिल हयात
अर्सा-ए-माह-ओ-साल से गुज़रे
आदिल फ़रीदी