Sad Poetry (page 337)

क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो

आदिल मंसूरी

कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया

आदिल मंसूरी

जो चुप-चाप रहती थी दीवार पर

आदिल मंसूरी

हुदूद-ए-वक़्त से बाहर अजब हिसार में हूँ

आदिल मंसूरी

दरिया की वुसअतों से उसे नापते नहीं

आदिल मंसूरी

चुप-चाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं

आदिल मंसूरी

आवाज़ की दीवार भी चुप-चाप खड़ी थी

आदिल मंसूरी

वो मर गई थी

आदिल मंसूरी

वक़्त की रेत पे

आदिल मंसूरी

वक़्त की पीठ पर

आदिल मंसूरी

वालिद के इंतिक़ाल पर

आदिल मंसूरी

टूटी लज़्ज़त की ख़ुशबू

आदिल मंसूरी

सियाह सायों की तिश्नगी में

आदिल मंसूरी

सियाह चाँद के टुकड़ों को मैं चबा जाऊँ

आदिल मंसूरी

सितारा सो गया है

आदिल मंसूरी

सातवीं पिसली में पीली चाँदनी

आदिल मंसूरी

सफ़ेद रात से मंसूब है लहू का ज़वाल

आदिल मंसूरी

साए की पिसली से निकला है जिस्म तिरा

आदिल मंसूरी

पत्थर पर तस्वीर बना कर

आदिल मंसूरी

नज़्म

आदिल मंसूरी

नज़्म

आदिल मंसूरी

लहू को सुर्ख़ गुलाबों में बंद रहने दो

आदिल मंसूरी

खिड़की अंधी हो चुकी है

आदिल मंसूरी

हश्र की सुब्ह दरख़्शाँ हो मक़ाम-ए-महमूद

आदिल मंसूरी

गोश्त की सड़कों पर

आदिल मंसूरी

गोल कमरे को सजाता हूँ

आदिल मंसूरी

फ़ैज़

आदिल मंसूरी

एक नज़्म

आदिल मंसूरी

एक मंज़र

आदिल मंसूरी

दर्द तंहाई की पस्ली से निकल कर आया

आदिल मंसूरी