Sad Poetry (page 336)
तुम्हारे हिज्र में क्यूँ ज़िंदगी न मुश्किल हो
अफ़सर इलाहाबादी
न हो या रब ऐसी तबीअत किसी की
अफ़सर इलाहाबादी
कुछ भी नहीं जो याद-ए-बुतान-ए-हसीं नहीं
अफ़सर इलाहाबादी
फ़लक उन से जो बढ़ कर बद-चलन होता तो क्या होता
अफ़सर इलाहाबादी
तिश्नगी बाक़ी रहे दीवानगी बाक़ी रहे
अफ़रोज़ तालिब
तलाश
अफ़रोज़ आलम
पल-दो-पल
अफ़रोज़ आलम
ख़याल
अफ़रोज़ आलम
यूँ ख़बर किसे थी मेरी तिरी मुख़बिरी से पहले
अफ़रोज़ आलम
तू मेरी नींदें तलाशता है यही बहुत है
अफ़रोज़ आलम
मौज-दर-मौज हवाओं से बचा लाऊँगा
अफ़रोज़ आलम
जिगर को ख़ून किए दिल को बे-क़रार अभी
अफ़रोज़ आलम
जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच
अफ़रोज़ आलम
जगा जुनूँ को ज़रा नक़्शा-ए-मुक़द्दर खींच
अफ़रोज़ आलम
हिसार-ए-दीद में रोईदगी मालूम होती है
अफ़रोज़ आलम
दुश्मनों को मिरे हमराज़ करोगे शायद
अफ़रोज़ आलम
बड़ा ख़ुशनुमा ये मक़ाम है नई ज़िंदगी की तलाश कर
अफ़रोज़ आलम
अत्तार के मस्कन में ये कैसी उदासी है
अफ़रोज़ आलम
ऐ दोस्त तिरी बात सहर-ख़ेज़ बहुत है
अफ़रोज़ आलम
शौक़-ए-वारफ़्ता चला शहर-ए-तमाशा की तरफ़
अफ़ीफ़ सिराज
शब ढली मेरी और सहर न हुई
अफ़ीफ़ सिराज
मुझ को इक अर्सा-ए-दिल-गीर में रक्खा गया था
अफ़ीफ़ सिराज
मेरे जुनून-ए-शौक़ को इतनी सी काएनात बस
अफ़ीफ़ सिराज
हम अहल-ए-नज़ारा शाम-ओ-सहर आँखों को फ़िदया करते हैं
अफ़ीफ़ सिराज
बरसों के जैसे लम्हों में ये रात गुज़रती जाएगी
अफ़ीफ़ सिराज
अंदाज़-ए-नुमू कैसा अलमनाक निकाला
अफ़ीफ़ सिराज
आप ने आज ये महफ़िल जो सजाई हुई है
अफ़ीफ़ सिराज
जो बन-सँवर के वो इक माह-रू निकलता है
अादिल रशीद
ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में
आदिल मंसूरी
तस्वीर में जो क़ैद था वो शख़्स रात को
आदिल मंसूरी