Sad Poetry (page 334)
वो अपने जुज़्व में खोया गया है इस हद तक
आफ़ताब इक़बाल शमीम
वैसे तो बहुत धोया गया घर का अंधेरा
आफ़ताब इक़बाल शमीम
तमीज़-ए-पिसर-ए-ज़मीन व इब्न-ए-फ़लक न करना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
तमीज़-ए-फ़र्ज़ंद-ए-अर्ज़-ओ-इब्न-ए-फ़लक न करना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
रिज़्क़ का जब नादारों पर दरवाज़ा बंद हुआ
आफ़ताब इक़बाल शमीम
नज़र के सामने रहना नज़र नहीं आना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
कभी ख़ुद को दर्द-शनास करो कभी आओ ना
आफ़ताब इक़बाल शमीम
जब चाहा ख़ुद को शाद या नाशाद कर लिया
आफ़ताब इक़बाल शमीम
दिखाई जाएगी शहर-ए-शब में सहर की तमसील चल के देखें
आफ़ताब इक़बाल शमीम
बात एक जैसी है हज्व या क़सीदा लिख
आफ़ताब इक़बाल शमीम
असीर-ए-हाफ़िज़ा हो आज के जहान में आओ
आफ़ताब इक़बाल शमीम
तिरे बदन के गुलिस्ताँ की याद आती है
आफ़ताब हुसैन
खिला रहेगा किसी याद के जज़ीरे पर
आफ़ताब हुसैन
गए ज़मानों की दर्द कजलाई भूली बिसरी किताब पढ़ कर
आफ़ताब हुसैन
अज़ाब-ए-बर्क़-ओ-बाराँ था अँधेरी रात थी
आफ़ताब हुसैन
अपने ही दम से चराग़ाँ है वगरना 'आफ़्ताब'
आफ़ताब हुसैन
ये जब्र भी है बहुत इख़्तियार करते हुए
आफ़ताब हुसैन
वो सर से पाँव तक है ग़ज़ब से भरा हुआ
आफ़ताब हुसैन
निगाह के लिए इक ख़्वाब भी ग़नीमत है
आफ़ताब हुसैन
मुनाफ़िक़त का निसाब पढ़ कर मोहब्बतों की किताब लिखना
आफ़ताब हुसैन
मक़ाम-ए-शौक़ से आगे भी इक रस्ता निकलता है
आफ़ताब हुसैन
किसी तरह भी तो वो राह पर नहीं आया
आफ़ताब हुसैन
कमी रखता हूँ अपने काम की तकमील में
आफ़ताब हुसैन
कहाँ किसी पे ये एहसान करने वाला हूँ
आफ़ताब हुसैन
जब सफ़र से लौट कर आने की तय्यारी हुई
आफ़ताब हुसैन
इस अँधेरे में जो थोड़ी रौशनी मौजूद है
आफ़ताब हुसैन
घड़ी घड़ी उसे रोको घड़ी घड़ी समझाओ
आफ़ताब हुसैन
गए मंज़रों से ये क्या उड़ा है निगाह में
आफ़ताब हुसैन
दिल भी आप को भूल चुका है
आफ़ताब हुसैन
धूप जब ढल गई तो साया नहीं
आफ़ताब हुसैन