Sad Poetry (page 353)
ख़्वाब की बस्ती में अफ़्साने का घर
अब्दुल मन्नान तरज़ी
ख़ून जब अश्क में ढलता है ग़ज़ल होती है
अब्दुल मन्नान तरज़ी
खुली जब आँख तो देखा कि था बाज़ार का हल्क़ा
अब्दुल मन्नान तरज़ी
जब निगाह-ए-तलब मो'तबर हो गई
अब्दुल मन्नान तरज़ी
जब भी गुलशन में चली ठंडी हवा
अब्दुल मन्नान तरज़ी
हर वरक़ इक किताब हो जाए
अब्दुल मन्नान तरज़ी
हर आन नई शान है हर लम्हा नया है
अब्दुल मन्नान तरज़ी
दिल की पर्वाज़ है ला-मकाँ तक
अब्दुल मन्नान तरज़ी
अपने हालात का असीर हूँ मैं
अब्दुल मन्नान तरज़ी
आँख पर ए'तिबार हो जाए
अब्दुल मन्नान तरज़ी
ज़िंदगी तुझ से प्यार क्या करते
अब्दुल मन्नान समदी
मेरे घर से उस की यादों के मकीं जाते नहीं
अब्दुल मन्नान समदी
वक़्त अब सर पे वो आया है कि सर याद नहीं
अब्दुल मलिक सोज़
तू जो आबाद है ऐ दोस्त मिरे दिल के क़रीब
अब्दुल मलिक सोज़
मुन्कशिफ़ तल्ख़ी-ए-हालात न होने पाई
अब्दुल मलिक सोज़
मुझ से मेरी हयात रूठ गई
अब्दुल मलिक सोज़
कुछ हसीं यादें भी हैं दीदा-ए-नम के साथ साथ
अब्दुल मलिक सोज़
हर मसर्रत से किनारा कर लिया
अब्दुल मलिक सोज़
हर मसर्रत से किनारा कर लिया
अब्दुल मलिक सोज़
दिल ग़म-ए-इश्क़ के इज़हार से कतराता है
अब्दुल मलिक सोज़
दिल अपना याद-ए-यार से बेगाना तो नहीं
अब्दुल मलिक सोज़
आज क्यूँ चुप हैं तेरे सौदाई
अब्दुल मलिक सोज़
तुझे कुछ इश्क़ ओ उल्फ़त के सिवा भी याद है ऐ दिल
अब्दुल मजीद सालिक
वो है हैरत-फ़ज़ा-ए-चश्म-ए-मा'नी सब नज़ारों में
अब्दुल मजीद सालिक
न मोहतसिब की न हूर-ओ-जिनाँ की बात करो
अब्दुल मजीद सालिक
मिरे दिल में है कि पूछूँ कभी मुर्शिद-ए-मुग़ाँ से
अब्दुल मजीद सालिक
ख़िरद में मुब्तिला है 'सालिक' दीवाना बरसों से
अब्दुल मजीद सालिक
जो मुश्त-ए-ख़ाक हो उस ख़ाक-दाँ की बात करो
अब्दुल मजीद सालिक
हम-नफ़सो उजड़ गईं मेहर-ओ-वफ़ा की बस्तियाँ
अब्दुल मजीद सालिक
ग़म के हाथों मिरे दिल पर जो समाँ गुज़रा है
अब्दुल मजीद सालिक