Couplets Poetry (page 247)
ख़ुदा से क्या मोहब्बत कर सकेगा
नरेश कुमार शाद
इतना भी ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न हो
नरेश कुमार शाद
गुनाहों से हमें रग़बत न थी मगर या रब
नरेश कुमार शाद
अक़्ल से सिर्फ़ ज़ेहन रौशन था
नरेश कुमार शाद
अल्लाह रे बे-ख़ुदी कि तिरे पास बैठ कर
नरेश कुमार शाद
आप आए तो मुझ को याद आया
नरेश कुमार शाद
ये अंजुमन ये क़हक़हे ये महवशों की भीड़
नक़्श लायलपुरी
नाम होंटों पे तिरा आए तो राहत सी मिले
नक़्श लायलपुरी
हम ने क्या पा लिया हिन्दू या मुसलमाँ हो कर
नक़्श लायलपुरी
अपनी पर्वाज़ को मैं सम्त भी ख़ुद ही दूँगा
नामी अंसारी
अपनी पर्वाज़ को मैं सम्त भी ख़ुद ही दूँगा
नामी अंसारी
वा'दे का ए'तिबार तो है वाक़ई मुझे
नख़्शब जार्चवि
कोई किस तरह राज़-ए-उल्फ़त छुपाए
नख़्शब जार्चवि
ये जिस्म टूट के हिस्सों में बटने वाला है
नज्मुस्साक़िब
उसे बे-नुमू किसी ख़्वाब ने कहीं गहरी नींद सुला दिया
नज्मुस्साक़िब
तुझ बिन ख़ाली रह कर कितने साल बिताने होंगे
नज्मुस्साक़िब
फिर एक बार लड़ाई थी अपनी सूरज से
नज्मुस्साक़िब
मिरे हाथ में तिरे नाम की वो लकीर मिटती चली गई
नज्मुस्साक़िब
मैं ही टूट के बिखरा और न रोया वो
नज्मुस्साक़िब
कौन है जो हर लम्हा सूरतें बदलता है
नज्मुस्साक़िब
कभी न टूटने वाला हिसार बन जाऊँ
नज्मुस्साक़िब
हुनूज़ रात है जलना पड़ेगा उस को भी
नज्मुस्साक़िब
दुख-भरा शहर का मंज़र कभी तब्दील भी हो
नज्मुस्साक़िब
दिल को आज तसल्ली मैं ने दे डाली
नज्मुस्साक़िब
बदन को जाँ से जुदा हो के ज़िंदा रहना है
नज्मुस्साक़िब
ज़मीन पाँव तले है न आसमाँ सर पर
नजमी सिद्दीक़ी
दर्द की लहर में ज़िंदगी बह गई
नजमा शाहीन खोसा
आख़िरी बार आया था मिलने कोई
नजमा शाहीन खोसा
वो उतर गए थे जो पार ख़ुद मुझे बीच बहर में छोड़ कर
नजमा ख़ान
ज़ुल्फ़ क्यूँ खोलते हो दिन को सनम
नाजी शाकिर