Couplets Poetry (page 248)
उस के रुख़्सार देख जीता हूँ
नाजी शाकिर
सिवाए गुल के वो शोख़ अँखियाँ किसी तरफ़ को नहीं हैं राग़िब
नाजी शाकिर
न सैर-ए-बाग़ न मिलना न मीठी बातें हैं
नाजी शाकिर
बुलंद आवाज़ से घड़ियाल कहता है कि ऐ ग़ाफ़िल
नाजी शाकिर
ख़याल अपना कमाल अपना उरूज अपना ज़वाल अपना
नजीबा आरिफ़, मोईनुद्दीन आक़िल
ज़िंदगी भर की कमाई ये तअल्लुक़ ही तो है
नजीब अहमद
ज़मीं पे पाँव ज़रा एहतियात से धरना
नजीब अहमद
वही रिश्ते वही नाते वही ग़म
नजीब अहमद
रुकूँ तो हुजला-ए-मंज़िल पुकारता है मुझे
नजीब अहमद
फिर यूँ हुआ कि मुझ पे ही दीवार गिर पड़ी
नजीब अहमद
'नजीब' इक वहम था दो चार दिन का साथ है लेकिन
नजीब अहमद
मिरी ज़मीं मुझे आग़ोश में समेट भी ले
नजीब अहमद
मिरी नुमूद किसी जिस्म की तलाश में है
नजीब अहमद
मौत से ज़ीस्त की तकमील नहीं हो सकती
नजीब अहमद
किस ने वफ़ा के नाम पे धोका दिया मुझे
नजीब अहमद
ख़ेमा-ए-जाँ की तनाबों को उखड़ जाना था
नजीब अहमद
इस दाएरा-ए-रौशनी-ओ-रंग से आगे
नजीब अहमद
हम तो समझे थे कि चारों दर मुक़फ़्फ़ल हो चुके
नजीब अहमद
इक तिरी याद गले ऐसे पड़ी है कि 'नजीब'
नजीब अहमद
आसमानों से ज़मीनों पे जवाब आएगा
नजीब अहमद
शब कितनी बोझल बोझल है हम तन्हा तन्हा बैठे हैं
नईम सिद्दीक़ी
निशाँ तो तेरे चलने से बनेंगे
नईम सिद्दीक़ी
सिले हों लब ज़बानें बंद तो बातें नहीं होतीं
नफ़ीर सरमदी
ज़िंदगी वक़्त के सफ़्हों में निहाँ है साहब
नफ़स अम्बालवी
ज़ख़्म अभी तक ताज़ा हैं हर दाग़ सुलगता रहता है
नफ़स अम्बालवी
ये इश्क़ के ख़ुतूत भी कितने अजीब हैं
नफ़स अम्बालवी
वो भीड़ में खड़ा है जो पत्थर लिए हुए
नफ़स अम्बालवी
उठा लाया किताबों से वो इक अल्फ़ाज़ का जंगल
नफ़स अम्बालवी
उसे गुमाँ है कि मेरी उड़ान कुछ कम है
नफ़स अम्बालवी
तू दरिया है तो होगा हाँ मगर इतना समझ लेना
नफ़स अम्बालवी