Couplets Poetry (page 246)
दिये अब शहर में रौशन नहीं हैं
नसीम सहर
ब-नाम-ए-अम्न-ओ-अमाँ कौन मारा जाएगा
नसीम सहर
आवाज़ों की भीड़ में इतने शोर-शराबे में
नसीम सहर
मुझ को ये दर-ब-दरी तू ने ही बख़्शी है मगर
नसीम निकहत
माना कि मैं हज़ार फ़सीलों में क़ैद हूँ
नसीम निकहत
बंजारे हैं रिश्तों की तिजारत नहीं करते
नसीम निकहत
अपने चेहरे को बदलना तो बहुत मुश्किल है
नसीम निकहत
तिरा जमाल बना मैं कभी, कभी एहसाँ
नसीम देहलवी
नाम मेरा सुनते ही शर्मा गए
नसीम देहलवी
आँखों में है लिहाज़ तबस्सुम-फ़िज़ा हैं लब
नसीम देहलवी
ये चोटी किस लिए पीछे पड़ी है
नसीम भरतपूरी
तुम्हारी तेग़ से आँखें लगी हैं मरने वालों की
नसीम भरतपूरी
तसल्लियाँ भी नहीं उन की छेड़ से ख़ाली
नसीम भरतपूरी
मुँह मेरी तरफ़ है तो नज़र ग़ैर की जानिब
नसीम भरतपूरी
दिल की शामत आई जा कर फँस गया
नसीम भरतपूरी
दे दें अभी करे जो कोई ख़ूब-रू पसंद
नसीम भरतपूरी
चराग़-ए-शाम-ए-ग़रीबी था में ज़माने में
नसीम भरतपूरी
अपनी महफ़िल में मुझे देख के कहता है वो बुत
नसीम भरतपूरी
मैं ने देखी है अमीर-ए-शहर की वो मुफ़्लिसी
नसीम अंसारी
मैं रौशनी पे ज़िंदगी का नाम लिख के आ गया
नसीम अंसारी
मैं रुक गया चढ़ी हुई नद्दी के सामने
नसीम अब्बासी
तिरे ख़याल से रौशन है सर-ज़मीन-ए-सुख़न
नरजिस अफ़रोज़ ज़ैदी
सुना है फूल झड़े थे जहाँ तिरे लब से
नरजिस अफ़रोज़ ज़ैदी
ज़िंदगी से तो ख़ैर शिकवा था
नरेश कुमार शाद
ये सोच कर भी हँस न सके हम शिकस्ता-दिल
नरेश कुमार शाद
तूफ़ान-ए-ग़म की तुंद हवाओं के बावजूद
नरेश कुमार शाद
महसूस भी हो जाए तो होता नहीं बयाँ
नरेश कुमार शाद
महफ़िल उन की साक़ी उन का
नरेश कुमार शाद
किसी के जौर-ओ-सितम का तो इक बहाना था
नरेश कुमार शाद
ख़ुदा से लोग भी ख़ाइफ़ कभी थे
नरेश कुमार शाद